भारतीय ज्योतिष के अनुशासन -पंडित भरत नागर*
* छापीहेड़ा
भारतीय विद्याए , भारतीय ज्ञान, सिद्धियां, तत्व ज्ञान, आयुर्वेद, वेदांत, ज्योतिष ये सारी विद्याएं अलौकिक हैं। ऋषियों की मेहनत , परिश्रम , त्याग के कारण ही आज हम उक्त विद्याओं का लाभ उठा पा रहे है। नाम हमारा हो सकता है , मेहनत सभी ऋषियों की हैं।
सभी विद्याओं के देवता व ऋषि पूर्व से ही हैं। अतः विद्याओं का मूल्यांकन मूल्य से नहीं हो सकता हैं। सत्यनिष्ठा , सत्कर्म, उच्चविकार, परमार्थ चिंतन के द्वारा ही उक्त विद्याओं के उत्तम परिणाम सामने आते हैं।
ज्योतिष की बात करे तो यह एक ईश्वरीय विद्या है । ऋषियों ने अपनी अभूतपूर्व मेहनत से इसे बनाया हैं। किसी का दुख , अहंकार, भय, अज्ञान, कष्ट को दूर करने की विद्याओं को ज्योतिष कहते हैं। सिद्ध निस्वार्थ, ज्ञानमार्गीय , परोपकारी ईश्वर को साक्षी मानकर जो कहता हैं व घोषणा करता है वह सत्य हो जाती हैं। ईश्वराधीन कार्य करने से ज्योतिषी का अहंकार नहीं बढ़ता हैं और वह सिद्ध यशस्वी होता चला जाता हैं। ज्योतिषी को सभी विद्याओं का थोड़ा ज्ञान हो , इन सभी का रसायन बनाकर निस्वार्थ तपस्या की आग में उसे तपाकर व ईश्वर की उपस्थिति मानकर ही कार्य करना चाहिए तभी वह ज्योतिषी बहुत लंबे समय तक कीर्तिवान बना रहेगा।
यह एक ईश्वर कृपा का प्रसाद है । जिसे लोकहित एवं सर्व जन सुखाय व सर्वजनहिताय के उद्देश्य से किया जाना चाहिए ।
समय क्या हैं, स्वयं के मनोभाव कैसे है, आगंतुक (आने वाला) की भौतिक , मानसिक स्थिति कैसी हैं । इस समय कौनसी चर्चा उसके लिए उचित हैं , आदि विषयों पर भी विचार किया जाना चाहिए ।
विषय तो बहुत लंबा हैं पर अभी यही विराम देना उचित हैं।
ईश्वर हम सब को सद्बुद्धि देवे ।
विनीत ~
भरत नागर s/o पंडित श्री श्यामलाल जी नागर
सहज धाम , छापीहेड़ा
YOUTUBE :- Sahaj_Dham_Chhapiheda
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