राजगढ़ जिले में सबसे पहले संघ कार्य का श्री गणेश खुजनेर नगर में पहली शाखा के माध्यम से सन 1939 में हुआ। और उसके बाद  सन 1944 में भाऊसाहब  इंदुरकर जिले के पहले जिला प्रचारक  नियुक्त होकर आये। तभी जिले में संघ कार्य को गति मिली। भाऊसाहब बताते हैं कि ' वहां रियासतों का काल था। किसी बाहरी व्यक्ति के आने पर ही निगरानी रखी जाती थी और यदि कोई किसी संगठन का कार्य करने आया हो तो और भी अधिक निगरानी रखी जाती थी पुलिस बार-बार पूछताछ करती थी। इस कारण स्वतंत्र रूप से संगठन का कार्य करना बहुत ही कठिन था। उन दिनों राजगढ़ के दीवान थे लेले।
 राजगढ़ में हो रही असुविधा को देखते हुए मैं इंदौर के एक बैंक मैनेजर काका टकले के पास पंहुचा और वहां जाकर मैंने दीवान साहब के बारे में बताया तो वह परिचित थे इस परिचय पत्र के माध्यम से मेरा उनसे व्यक्तिगत परिचय हुआ और पुलिस से पीछा छूटा। ,
प्रचारक भाऊसाहब बताते थे कि *राजगढ़ की पहली शाखा रामलीला मैदान* में लगती थी वहां के प्रारंभिक स्वयंसेवकों में गोविंदवल्लभ त्रिपाठी, प्रीतम लाल जोशी, चुन्नीलाल मौर्य, लक्ष्मी नारायण प्रजापति,श्रीनाथ गुप्ता और शंभूदयाल सक्सेना थे। 

 इसी तरह ब्यावरा की पहली शाखा अग्रवाल धर्मशाला में प्रारंभ हुई थी उसमें प्रारंभिक दौर पर जुड़ने वाले स्वयंसेवक लक्ष्मीनारायण मेवाड़ा (मुंशी जी), विष्णुदत्तजी गुप्ता,रामनारायण शर्मा, गिरधारी लाल काछी व ब्रजकिशोर शर्मा है। 

 नरसिंहगढ़ की पहली शाखा 1942 में प्रारंभ हुई और 1944 में यहां बालकृष्ण सप्त ऋषि प्रचारक बनकर आए। यहां के स्वयंसेवक थे किशनलाल मंडलोई, आत्माराम देशवाली।

 इसी तरह खुजनेर की शाखा वहीं के निवासी हरिनारायण टेलर ने शुरू की थी। सारंगपुर में उनका एक स्वयंसेवक से परिचय हुआ उन्होंने अपने गांव में शंकर जी की बगीचे में शाखा लगाना प्रारंभ की। 

 जीरापुर में सन 1944 में कमलाकर शुक्ला जी प्रचारक नियुक्त किए गए थे और अपनी संगठन कुशलता से जीरापुर के गांव गांव तक उन्होंने संघ कार्य को पहुंचा था। इस कल्पना हम एक तथ्य से भी कर सकते हैं कि सन् 1946 में विजयादशमी उत्सव में 2000 लोगों की उपस्थिति रही थी।


 भाऊसाहब इंदुरकर सन 1944 तक इस जिले के जिला प्रचारक रहे
 उसके पश्चात भोपाल के सनत कुमार बनर्जी यहां प्रचारक नियुक्त हुए। वह अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे, उनके कारण अनेक कर्मचारी अधिवक्ता डॉक्टर संघ से जुड़े। राजगढ़ में तो कर्मचारियों की अलग से शाखा लगने लगी थी। 
 उज्जैन के शारदाशंकर व्यास द्वितीय वर्ष का संघ शिक्षा वर्ग करने गए थे, वहीं से प्रचारक बनने का निश्चय कर वापस लौटे नौकरी से त्यागपत्र देकर प्रचारक जीवन की शुरुआत की और वहां से ब्यावरा तहसील में संघ कार्य विस्तार के लिए पहुंच गए। बाद में वहां 1950 तक जिला प्रचारक के रूप में रहे

 सन 1952 में दत्ता जी उननगांवकर शाजापुर व राजगढ़ संयुक्त जिले के प्रचारक बनकर आए।उनके कार्यकाल में ही जिले में सौ शाखाओं के लक्ष्य को प्राप्त किया।

 सन 1978 तक राजगढ़- ब्यावरा का क्षेत्र शाजापुर जिले के साथ संयुक्त रहा। उसके पश्चात राजगढ़ को अलग से जिला बनाया गया।
 उसे समय श्री संतोष त्रिवेदी संयुक्त जिले का काम देखते थे।
 इसके बाद माखन सिंह चौहान शाजापुर और परमानंद  मनोहर राजगढ़ ब्यावरा जिले के जिला प्रचारक नियुक्त किए गए थे।


 राजगढ़ जिले में तब से लेकर अब तक 14 जिला प्रचारकों ने संघ कार्य को आगे बढ़ने का काम किया।


 किसी तरह संघ कार्य से प्रभावित होकर तब से लेकर अब तक
 17 लोगों ने प्रचारक जीवन में प्रवेश किया है :-
1. श्री सुरेश सोनी
2. श्री परमानंद मनोहर जी
3. श्री जितेंद्र सिंह पवार
4. स्वर्गीय भगवत शरण माथुर
5. श्री गिरिराज धरण शर्मा
6. श्री रोडमल नागर
7. स्वर्गीय श्री राम गोपाल शर्मा 
8. सत्यनारायण सोनी 
9. श्री महेश चौधरी 
10. श्री धीरज सिंह चौहान 
11. श्री प्रहलाद विश्वकर्मा 
12.स्वर्गीय श्री गोपाल विश्वकर्मा 
13.श्री प्रकाश मंडलोई 
14.श्री रविंद्र पोद्दार 
15.श्री राधेश्याम पाटिल 
16.श्री मोहन नागर
17. ओम जी टांक
18 पुरुषोत्तम चन्द्रवंशी      
     कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के लिए यह है क्रम:-
 संघ में प्रवेश लेने के लिए तीन दिवसीय प्रारंभिक प्राथमिक वर्ग होता है तत्पश्चात साथ दिवसीय प्राथमिक वर्ग उसके बाद कार्यकर्ता के व्यवहार और गुण को देखते हुए 
 संघ शिक्षा वर्ग 
 कार्यकर्ता विकास वर्ग भाग 1
 कार्यकर्ता विकास वर्ग भाग 2 


 संघ पर पहला प्रतिबन्ध
 पहले प्रतिबंध के समय ब्यावर से 10 कार्यकर्ता बंदी बनाए गए थे लक्ष्मीनारायण मेवाड़ा पंचायत विभाग में सेवारत थे संघ कार्य में सक्रिय रहने के कारण ही शासन ने सेवा से पृथक कर दिया था उनको बंदी बनाकर नगर में हथकड़ी लगाकर घुमाया और वह घर प्रताड़ना चलने के बाद भी संघ कार्य में निरंतर जुटे रहे थे.

 आपातकाल
 जिले के लगभग सभी प्रमुख केंद्रों से कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुई थी। मीसा या डी ए आर के काले कानून में ब्यावरा के 14 राजगढ़ के 12 खुजनेर के तीन नरसिंहगढ़ के पांच जीरापुर के. खिलचीपुर के 2 साथ कुरावर के तीन तलेन के एक तथा सारंगपुर के दो कार्यकर्ताओं को बंदी बनाकर जेल में कैद करके रखा गया था

 प्रेरक प्रसंग

 संघ में कार्यकर्ता का कितना महत्व है और तय कार्यक्रम को किसी भी स्थिति में पूरा करना ही कार्यकर्ता का लक्ष्य रहता है इसका केवल आग्रह नहीं किया जाता है वर्णन समय-समय पर वरिष्ठ कार्यकर्ताओं द्वारा अपने व्यवहार में क्रियान्वित कर अपने उदाहरण भी प्रस्तुत किए जाते हैं।
 ऐसा ही प्रेरक सन 1946 में तब घटित हुआ जब माननीय एकनाथ जी रानडे ब्यावर प्रवास पर आने वाले थे सुजालपुर का कार्यकर्ता पूर्ण कर ब्यावर जाने के लिए जब वह बस स्टैंड पर पहुंचे तो पाया कि बस तो निकल चुकी है उन यातायात के इतने साधन नहीं थे अन्य कोई व्यवस्था भी नहीं थी सुजालपुर के कार्यकर्ता ने आग्रह किया आप यहीं रुक जाएं ब्यावर जाना तो संभव नहीं है एकनाथ जी इस बात को कैसे स्वीकार कर सकते थे कि उनके कार्यक्रम में पहुंचने की सूचना हो और वह नहीं पहुंचे उन्होंने एक कार्यकर्ता से साइकिल ली और उसमें सवार होकर और ब्यावरा तक की यात्रा की।

 वर्तमान में  संघ कार्य की दृष्टि से राजगढ़ शासकीय जिला के दो भाग है जिसमें राजगढ़, खिलचीपुर खुजनेर,छापीहेड़ा, जीरापुर और माचलपुर खंड शामिल हैं.
 इसी तरह ब्यावरा जिला अलग है जिसमें ब्यावरा,सुठालिया,पचोर, सारंगपुर,नरसिंहगढ़ और कुरावर खंड शामिल है। 

 वर्तमान की बात की जाए तो अभी तक राजगढ़ और ब्यावरा दोनों संयुक्त जिले से लगभग 20 से अधिक लोग अपना घर परिवार छोड़कर और संघ कार्य के लिए किसी अन्य प्रदेश में या राजगढ़ जिले से किसी अन्य जिले में प्रचारक रहकर संघ कार्य को गति प्रदान कर रहे हैं..