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माचलपुर खंड के बाड़गांव मंडल मे संघ के पथ संचलन मे अपने उद्बोधन मे जिला कार्यावह मनीष वैष्णव बोले...

प्राचीन काल से भारत वर्ष मे शक्ति कि आरधना का पर्व विजयादशमी पर नो दिन शक्ति कि उपासना कर.. मनाया जाता है. यह परम्परा सनातन काल से महाभारत काल मे पांडवो द्वारा शमी पूजन. भगवान राम द्वारा अधर्म पर धर्म कि विजय.. के रूप मे. छत्रपति शिवाजी द्वारा सिमोलघन करना.

मातृभूमि कि रक्षा धर्म कि रक्षा हेतु शस्त्र व शास्त्र कि पूजन संचालन समय आने पर उपयोग करना यही राष्ट्र धर्म है..

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी और आज़ादी के 100 वर्ष की ओर बढ़ते हुए इसके कार्य का मूल उद्देश्य और अब तक की साधना परिणाम यह है कि

1. भारत को एक सशक्त, आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से जागृत राष्ट्र बनाना।

2. हिंदू समाज का संगठन – जाति, प्रांत, भाषा और पंथ से ऊपर उठकर समरसता का भाव पैदा करना।

3. राष्ट्रीय चरित्र निर्माण – अनुशासन, सेवा, राष्ट्रभक्ति और त्याग की भावना विकसित करना।

4. समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सकारात्मक दिशा वि दृष्टि विकसित करना – शिक्षा, ग्राम विकास, सेवा, पर्यावरण, सुरक्षा और संस्कृति।

1. संघ का बीज बोया गया प्रारंभ के 15 वर्ष परम पूजनीय डॉक्टर जी के जीवन काल का संघ ।

2. संघ के काम को राष्ट्रव्यापी बनाया गया 1940 से 1973 तक परम पूजनीय श्री गुरु जी का कालखंड ।

3. विभिन्न प्रकार की उपेक्षा उपहास को पार कर स्वीकारोक्ति 1975 का आपातकाल प्रतिबंध के काल में कुंदन की तरह निखर कर उभरा संघ। 

4. संघ और समाज एक हो गए आज समाज में हर व्यक्ति कहने लगा है हमको भी काम बताइए। 100 वर्ष की साधना सांस्कृतिक रूप से जागृत सब भेदों से ऊपर उठकर व्यक्ति निर्माण की पाठशाला मैं चरित्र निर्माण। सकारात्मक को लेकर मेरा ध्येय मेरा मिशन राष्ट्र हो सकता है क्या ?

आज पूरी दुनिया में सबसे बड़ा स्वावलंबी और स्वयंसेवी संगठन एक करोड़ से ज्यादा स्वयंसेवक संघ के विचार को लेकर विविध संगठनों का जाल खड़ा हुआ है। प्राचीन काल में जिस प्रकार से ऋषि मुनि भारत से बाहर अपने विचारों के प्रसार के लिए गए इसी तरह आज संघ प्रत्यक्ष रूप से 60 देश में अपने विचारों को लेकर कार्य कर रहा है। संघ कार्य लगातार चल रहा है किसी विरोधी के कारण रुका नहीं है स्वयंसेवकों ने जैसा कहा वैसा किया कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं है इसीलिए समाज ने स्वीकार किया और आज समाज ने करना भी प्रारंभ किया । स्वयंसेवक चमड़ी और दमड़ी दोनों लगा कर सभी बाधाओं को पार करते हुए  संघ रूपी नाव को आगे बढ़ा रहा है। नेतृत्व पर श्रद्धा है और विश्वास है। बाधा आने पर मानते हैं कि भगवान परीक्षा ले रहा है।

 

100 वर्षों की  संघर्ष मय साधना के परिणाम और उपलब्धियां कि और देखेंगे तो ध्यान आयेगा कि

• आज RSS विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है।

• लाखों कार्यकर्ता, शाखाएँ और सहायक संगठनों का व्यापक नेटवर्क।

• विदेशों तक फैला भारतीय संस्कृति और समाज सेवा का कार्य।

 

2. सामाजिक कार्य मे अग्रणी संघ के स्वयंसेवक. जैसे

• बाढ़, भूकंप, महामारी जैसे आपदाओं में सेवा कार्य।करते नजर आते है.

• शिक्षा संस्थानों, छात्रावासों और सेवा परियोजनाओं की स्थापना।

• वंचित वर्गों और वनवासी क्षेत्रों तक पहुँच।

• सामाजिक समरसता और जातिभेद मिटाने के प्रयास।एक श्मशान,एक कुआँ,एक पानी  का स्थान 

3. राष्ट्रीय पुनर्जागरण

राम मंदिर ,राम सेतु ,अमरनाथ यात्रा ,उडुपी धर्माचार्य सम्मेलन १९६९,

• भारतीय संस्कृति और गौरव की पुनः प्रतिष्ठा।

. स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की भावना को बल।

• अखंड भारत, सांस्कृतिक राष्ट्र की कल्पना और “वसुधैव कुटुम्बकम्” के विचार को आगे बढ़ाना।

👉• प्रत्यक्ष राजनीति से दूर रहकर भी संघ की विचारधारा से प्रेरित कार्यकर्ताओं ने विभिन्न राजनीतिक क्षेत्र में भी एक नया इतिहास रचा है.....

 

धारा 370 और अनेक प्रयत्नों जैसे सर्जिकल स्ट्राइक, सिंदूर ऑपरेशन, चंद्रमा पर तिरंगा, खेलों में प्रतिभाओं को विश्व मंच पर स्थान ..मिलना...

• राष्ट्रीय स्तर पर नीतियों और शासन व्यवस्था में सांस्कृतिक दृष्टिकोण का प्रवेश।

 

5. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान

• हिंदू संस्कृति और भारतीय मूल्यों का विश्व पटल पर प्रसार।

• प्रवासी भारतीय समाज को जोड़कर राष्ट्रीय चेतना को बढ़ावा देना।

 

100 वर्षों की साधना का सार यह है कि RSS ने केवल एक संगठन नहीं बनाया, बल्कि समाज का चरित्र गढ़ने का प्रयास किया है।

• सेवा, संगठन और संस्कार की त्रिवेणी को जीवन का आधार बनाया।

• राष्ट्र को “एकात्म मानव दर्शन” और “सांस्कृतिक राष्ट्रीयत्व ” की राह पर अग्रसर करने का प्रयत्न किया।

स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका

• डॉ. हेडगेवार बचपन से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय थे।जन्मजात देशभक्त 

उदाहरण- मिठाई फेकना ,वंदेमातरम् बुलवाना,यूनियन जेक उतारने की योजना बनाना 

• असहयोग आंदोलन (1921) – डॉ. हेडगेवार को राजद्रोह के आरोप में 1 वर्ष की जेल।

• साइमन कमीशन विरोध (1928) – संघ के स्वयंसेवकों की सक्रिय भागीदारी।

• 26 जनवरी 1930 – संघ की शाखाओं में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।

• सविनय अवज्ञा आंदोलन – स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह कर जेल यात्राएँ कीं।

• भारत छोड़ो आंदोलन (1942) – संघ कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और बलिदान; कुछ स्थानों पर “स्वतंत्र सरकार” की स्थापना तक।

• शहीद राजगुरु भी RSS की शाखा से जुड़े थे।

 

5. स्वतंत्रता के बाद RSS की भूमिका

• विभाजन (1947): लाखों हिंदुओं की सुरक्षा और पुनर्वास का कार्य।

• कश्मीर, हैदराबाद, गोवा आंदोलनों में योगदान।

• 1962, 1965, 1971 के युद्धों में भारतीय सेना की सहायता।

• 1975 का आपातकाल – भूमिगत संगठन के रूप में लोकतंत्र की रक्षा।

• राम जन्मभूमि आंदोलन – निर्णायक भूमिका।

• आधुनिक काल में – सेवा, संगठन, संस्कार और “एकात्म मानव दर्शन” पर आधारित सांस्कृतिक राष्ट्रीयत्व के दर्शन को आगे बढ़ाना l 

भारत की स्वाधीनता की यात्रा को ७५ वर्ष पूर्ण कर अमृत काल चल रहा है l 

 

हिंदू संगठन के ईस कार्य को सर्वव्यापी बनाने की दृष्टि से सब समाज को साथ आना होगा ,वास्तव में तो ये हिंदू संगठन का शताब्दी वर्ष है l 

 

आओ हम सब राष्ट्रीय पुनर्जागरण की ईस वेला में और अधिक सक्रिय होकर देश के लिए और अधिक समय देवे ,

समाज परिवर्तन के ईस वैचारिक आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से जुड़ कर अपने आपको प्रस्तुत करे l