"पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट डॉ नयन प्रकाश गांधी के अनुसार ये चमकते आंकड़े भारत जैसे  गर्व का विषय हैं, लेकिन लगातार बढ़ती जनसंख्या के बीच पोषण, आय समानता और स्वास्थ्य सेवाओं में समावेशी सुधार मुख्य चुनौती बने रहेंगे। इन पर केंद्रित नीतियां ही विकास को स्थायी बनाएंगी,भारत आज विकास के एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है, जहां सरकार की नीतियां, तकनीक की ताकत और नागरिकों का परिश्रम मिलकर ऐसे परिणाम दे रहे हैं, जिन पर न सिर्फ देश, बल्कि दुनिया की नजर टिकी है”

पिछले एक दशक में केंद्र सरकार ने आम लोगों की जेब पर पड़ने वाले बोझ को कम करने के लिए महंगाई को नियंत्रण में रखना प्राथमिक लक्ष्य बनाया है। पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में खुदरा महंगाई आरबीआई के दायरे से नीचे रही और दिसंबर 2025 में 1.33 प्रतिशत के आसपास दर्ज की गई, जो दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी कम है। खाद्यान्न का बढ़ा हुआ उत्पादन, लक्षित सब्सिडी और मजबूत सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने रोज़मर्रा की ज़रूरतों की कीमतों के दबाव को काफी हद तक नरम किया। इसका सीधा लाभ शहरी झुग्गी बस्तियों, निम्न‑मध्यम वर्ग और असंगठित मजदूरों को मिला, जिन पर महंगाई का असर सबसे पहले और सबसे ज्यादा पड़ता है।  महंगाई प्रबंधन के साथ‑साथ बुनियादी ढांचे में तेज़ निवेश, डिजिटल भुगतान की बढ़ती रफ्तार और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने बाजार की प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी बनाया। बिचौलियों की पकड़ कमजोर हुई, आपूर्ति शृंखला मजबूत हुई और कई बार कीमतों में अचानक उछाल की संभावनाएं भी कम हुईं। विकास और स्थिरता का यही संयोजन नए भारत की आर्थिक दिशा को स्पष्ट करता है।  

🛟दूध उत्पादन में नंबर‑1 भारत  

नए भारत की उड़ान का सबसे मजबूत आधार ग्रामीण अर्थव्यवस्था है, जिसमें डेयरी क्षेत्र ने अभूतपूर्व ताकत दिखाई है। आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और वैश्विक उत्पादन में लगभग 25 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अकेले हमारे किसान देते हैं। 2014‑15 में करीब 146 मिलियन टन से शुरू हुई यह यात्रा 2024‑25 में लगभग 248 मिलियन टन तक पहुंच गई है। ये आंकड़े बताते हैं कि गांव‑गांव में फैले छोटे पशुपालकों की मेहनत को सरकार की नीतियों और योजनाओं ने सही दिशा दी है। दूध उत्पादन में वृद्धि के साथ गुणवत्ता और वैल्यू‑एडिशन पर भी बराबर जोर है। शीत‑श्रृंखला की मजबूती, दुग्ध सहकारी समितियों का विस्तार और डेयरी अवसंरचना में निवेश ने किसानों के लिए स्थायी बाज़ार तैयार किया। घी, पनीर, दही, आइसक्रीम और पैकेज्ड दूध जैसे उत्पादों की बढ़ती मांग ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को शहरों से सीधे जोड़ दिया और पोषण सुरक्षा के नए रास्ते भी खोले।  

🛟जेनेरिक दवाओं और वैक्सीन की वैश्विक राजधानी  

मोदी युग की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक भारत की पहचान “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” के रूप में और मजबूत होना है। आज विश्व भर में बेची जा रही जेनेरिक दवाओं के बाजार में भारत की हिस्सेदारी लगभग पांचवें हिस्से के बराबर मानी जा रही है। सस्ती और भरोसेमंद भारतीय दवाएं अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के करोड़ों मरीजों के लिए जीवनदायिनी साबित हो रही हैं। भारतीय दवा उद्योग उत्पादन के लिहाज से दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल है और सैकड़ों संयंत्र अंतरराष्ट्रीय मानकों का कड़ाई से पालन करते हैं।  वैक्सीन के क्षेत्र में भारत की भूमिका और भी अहम है। दुनिया में इस्तेमाल होने वाली कुल वैक्सीन का बड़ा हिस्सा भारतीय कंपनियां बनाती हैं और कई प्रमुख टीकों की वैश्विक मांग का अधिकांश भाग भी भारत से पूरा होता है। कोविड‑19 महामारी के समय तैयार हुआ मजबूत उत्पादन ढांचा, शोध क्षमता और नियामकीय व्यवस्था अब भविष्य की किसी भी स्वास्थ्य आपदा से निपटने की गारंटी बन चुकी है। “मेड इन इंडिया” वैक्सीन आज अनेक देशों के टीकाकरण अभियान की रीढ़ बन चुके हैं, जो आत्मनिर्भर भारत के साथ‑साथ वैश्विक सहयोग की भारतीय सोच को भी सामने लाते हैं।  

🛟कृषि और बागवानी में रिकॉर्ड, गांवों में नया आत्मविश्वास  

कृषि क्षेत्र में भी नया भारत नए कीर्तिमान रच रहा है। 2024‑25 के तीसरे अग्रिम अनुमानों के अनुसार देश का खाद्यान्न उत्पादन लगभग 3323 लाख मीट्रिक टन तक पहुंचने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि है। बेहतर सिंचाई, गुणवत्तापूर्ण बीज, किफायती कर्ज, तकनीक और फसल बीमा जैसी पहलों ने खेतों की उत्पादकता को नई ऊंचाई दी है। न्यूनतम समर्थन मूल्य में नियमित बढ़ोतरी और खरीद व्यवस्था के सुदृढ़ होने से किसान की आय को भी सुरक्षा मिली है। बागवानी में भारत ने और भी तेज छलांग लगाई है। फल, सब्जी, मसाला और फूलों का संयुक्त उत्पादन 2024‑25 में लगभग 369 मिलियन टन के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंचा है। इससे पोषण विविधता के साथ‑साथ प्रसंस्करण उद्योग, कोल्ड‑स्टोरेज और लॉजिस्टिक नेटवर्क को नई ऊर्जा मिली है। छोटे और सीमांत किसान अब सीधे प्रोसेसिंग यूनिटों तथा आधुनिक खुदरा चेन से जुड़ रहे हैं, जिससे गांवों में ही मूल्य संवर्धन और रोज़गार के अवसर बढ़ रहे हैं।  

🛟आत्मनिर्भर भारत की मजबूत जड़ें, लेकिन चुनौतियां भी  

दूध, दवा, वैक्सीन और खाद्यान्न जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में मिली ये सफलताएं सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि स्पष्ट नीतियों, लक्ष्य‑आधारित कार्यक्रमों और नागरिकों की भागीदारी का परिणाम हैं। बढ़ती उत्पादन क्षमता ने भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में मजबूत स्थान दिया है और घरेलू बाजार को भी ज्यादा सुरक्षित बनाया है। हर संकट के समय “आत्मनिर्भर भारत” की भावना अब केवल नारे में नहीं, बल्कि ठोस आंकड़ों में दिखाई देती है।फिर भी कुछ चुनौतियां सामने हैं। पोषण असमानता, कृषि आय में बड़े अंतर, शहरी‑ग्रामीण खाई और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच जैसे प्रश्न अभी भी समाधान की प्रतीक्षा में हैं। पब्लिक पॉलिसी विशेषज्ञ डॉ. नयन प्रकाश गांधी का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी इन मोर्चों पर सक्रिय पहल कर रहे हैं, लेकिन स्थायी समाधान के लिए निरंतर प्रयास और व्यापक सामाजिक भागीदारी जरूरी होगी। नए भारत की उड़ान को टिकाऊ बनाने के लिए आवश्यक है कि चमकते आंकड़ों के साथ‑साथ समावेशन, पर्यावरणीय संतुलन और मानव विकास के मानदंडों को भी उतनी ही गंभीरता से साधा जाए। स्पष्ट है कि भारत आज विकास के एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है, जहां सरकार की नीतियां, तकनीक की ताकत और नागरिकों का परिश्रम मिलकर ऐसे परिणाम दे रहे हैं, जिन पर न सिर्फ देश, बल्कि दुनिया की नजर टिकी है।