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"अंतरराष्ट्रीय लाइफ एन.एल.पी करियर कोच डॉ नयन प्रकाश गांधी के अनुसार राजस्थान कोचिंग केंद्र (नियंत्रण और विनियमन) विधेयक, 2025' एक संतुलित और व्यावहारिक कानून है, जो कोचिंग उद्योग को जवाबदेह बनाने के साथ-साथ अभिभावकों और छात्रों की भूमिका को भी महत्व देता है। यह एक प्रगतिशील ढांचा है जो व्यवस्था में सुधार की नींव रखता है"

 राजस्थान सरकार द्वारा प्रस्तुत 'राजस्थान कोचिंग केंद्र (नियंत्रण और विनियमन) विधेयक, 2025' अपने संशोधित स्वरूप में, एक अत्यंत आवश्यक और साहसिक कदम है जो दशकों से अनियंत्रित चल रहे कोचिंग उद्योग को एक औपचारिक और जवाबदेह ढांचे में लाने का प्रयास करता है। इसे "कागजी शेर" या "कमजोर समझौता" कहना उन महत्वपूर्ण सुधारों की अनदेखी करना है जो यह कानून छात्रों, अभिभावकों और स्वयं उद्योग के लिए लेकर आया है। यह एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाता है जो विनियमन और व्यावहारिकता के बीच एक नाजुक संतुलन स्थापित करता है। यह सच है कि कोटा जैसे कोचिंग केंद्रों में छात्रों पर अत्यधिक दबाव और उससे उपजी त्रासदियां एक गंभीर राष्ट्रीय चिंता का विषय हैं। लेकिन इस समस्या का समाधान केवल कोचिंग संस्थानों को खलनायक बनाकर नहीं किया जा सकता। यह एक जटिल सामाजिक-पारिस्थितिक तंत्र है जिसमें छात्र, अभिभावक, स्कूल प्रणाली और समाज की अपेक्षाएं सभी अपनी भूमिका निभाते हैं। राजस्थान सरकार ने इस विधेयक के माध्यम से एक समग्र दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास किया है, जो दंडात्मक होने के बजाय सुधारात्मक है।
एक ईमानदार प्रयास: विधेयक के सकारात्मक और व्यावहारिक पहलू
आलोचकों ने जुर्माने की राशि कम करने और विनियमन के दायरे को 100 छात्रों तक सीमित करने पर ध्यान केंद्रित किया है, लेकिन वे उन व्यापक और दूरगामी प्रावधानों को नजरअंदाज कर रहे हैं जो इस उद्योग की कार्यप्रणाली को मौलिक रूप से बदल देंगे।
1. निजी क्षेत्र का सम्मान और व्यावहारिकता:
कोचिंग संस्थान निजी संस्थाएं हैं जो एक सेवा प्रदान करती हैं। वे एक कोच की तरह काम करते हैं जो छात्रों को उनके लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करते हैं। अधिकांश संस्थान ईमानदारी से काम करते हैं और अपने छात्रों की सफलता के लिए प्रतिबद्ध हैं। सरकार ने इस विधेयक में "इंस्पेक्टर राज" को बढ़ावा देने के बजाय एक सहयोगी नियामक ढांचा बनाने का प्रयास किया है। 100 छात्रों की सीमा छोटे संस्थानों को अनावश्यक नौकरशाही से बचाती है, जबकि बड़े, संगठित खिलाड़ियों को जवाबदेही के दायरे में लाती है। इसी तरह, जुर्माने को व्यावहारिक स्तर पर लाना यह सुनिश्चित करता है कि कानून का उद्देश्य उद्योग को नष्ट करना नहीं, बल्कि उसे अनुशासित करना है।
2. अभिभावकों की भूमिका और जिम्मेदारी:
छात्रों के कल्याण की प्राथमिक जिम्मेदारी हमेशा उनके माता-पिता की होती है। कोचिंग संस्थान केवल कुछ घंटों के लिए अकादमिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं, लेकिन छात्र का भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य काफी हद तक पारिवारिक समर्थन और माहौल पर निर्भर करता है। यह विधेयक परोक्ष रूप से इस बात को स्वीकार करता है कि माता-पिता को भी अपने बच्चों पर अवास्तविक अपेक्षाओं का बोझ डालने से बचना चाहिए। कोचिंग संस्थानों में परामर्श प्रणाली की स्थापना का उद्देश्य केवल छात्रों की मदद करना नहीं, बल्कि अभिभावकों को भी जागरूक करना है ताकि वे अपने बच्चों की क्षमताओं और रुचियों को बेहतर ढंग से समझ सकें।
3. वित्तीय पारदर्शिता और उपभोक्ता संरक्षण:
यह विधेयक का सबसे मजबूत और निर्विवाद रूप से छात्र-हितैषी पहलू है।
प्रो-राटा रिफंड: कोर्स बीच में छोड़ने पर आनुपातिक आधार पर फीस वापसी का प्रावधान एक क्रांतिकारी कदम है। यह छात्रों और अभिभावकों को एक "एग्जिट ऑप्शन" देता है और संस्थानों को अपनी सेवा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए मजबूर करता है।
किस्तों में भुगतान: एकमुश्त फीस की बाध्यता को समाप्त करना मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए एक बहुत बड़ी राहत है। यह वित्तीय बोझ को कम करता है और शिक्षा को अधिक सुलभ बनाता है।
निशुल्क अध्ययन सामग्री: संस्थानों को नोट्स और स्टडी मटेरियल निशुल्क उपलब्ध कराने का निर्देश यह सुनिश्चित करता है कि छात्रों से छिपी हुई लागतों के नाम पर अतिरिक्त पैसे न वसूले जाएं  
4. मानसिक स्वास्थ्य को केंद्र में रखना:
यह पहली बार है कि कोई राज्य सरकार इस स्तर पर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे को संबोधित कर रही है। अनिवार्य परामर्श प्रणाली, मनोवैज्ञानिकों की उपलब्धता, और तनाव प्रबंधन पर नियमित कार्यशालाएं यह दर्शाती हैं कि सरकार छात्रों को केवल एक "रैंक-उत्पादक मशीन" के रूप में नहीं देखती है। यह एक संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण है जिसकी सराहना की जानी चाहिए।
एकमात्र चिंता: 16 वर्ष की आयु सीमा का मुद्दा
इस समग्र सकारात्मक विधेयक में एक चिंता का विषय निश्चित रूप से है, और वह है कोचिंग में प्रवेश के लिए न्यूनतम 16 वर्ष की आयु सीमा के केंद्रीय दिशानिर्देश को न अपनाना। राजस्थान सरकार ने तर्क दिया है कि अन्य राज्यों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं होने के कारण, इसे लागू करने से राज्य को राजस्व का नुकसान हो सकता है । यह एक व्यावहारिक चिंता हो सकती है, लेकिन इसके दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कई मनोवैज्ञानिक अध्ययनों और सर्वेक्षणों से यह स्पष्ट है कि कम उम्र में अत्यधिक प्रतिस्पर्धी दबाव बच्चों के विकासशील मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। यह चिंता, तनाव और "बर्नआउट" का कारण बन सकता है, जो अंततः उन दुखद घटनाओं में परिणत हो सकता है जिन्हें यह विधेयक रोकने का प्रयास कर रहा है। कम उम्र के छात्र सामाजिक और भावनात्मक रूप से उतने परिपक्व नहीं होते कि वे असफलता और दबाव को संभाल सकें।
यह विधेयक का एकमात्र ऐसा पहलू है जहां सरकार का निर्णय भविष्य में प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। यह उम्मीद की जाती है कि सरकार इस मुद्दे पर पुनर्विचार करेगी या वैकल्पिक सुरक्षा उपाय विकसित करेगी, जैसे कि 16 वर्ष से कम उम्र के छात्रों के लिए एक अलग, कम-दबाव वाला और अधिक समग्र पाठ्यक्रम अनिवार्य करना। इंटरनेशनल लाइफ कोच डॉ नयन प्रकाश गांधी मानते है कि स्टूडेंट किसी भी उम्र का हो प्रवेश से पहले बच्चों का बिल्कुल सरल आधारभूत सब्जेक्टिव टेस्ट के साथ मनोवैज्ञानिक टेस्ट भी लिया जाए 
जिससे बिल्कुल कमजोर एवं  अंतर्मन से कमजोर बच्चों का परीक्षण किया जा सके और करियर विशेष के प्रति उसके स्वयं की रुचि और माता पिता के दबाव का भी परीक्षण किया जा सके ताकि काउंसलिंग के समय ही यह ज्ञात हो सके कि बच्चा जिस क्षेत्र के लिए कोचिंग प्रवेश हेतु संस्थान में आया है वह उस क्षेत्र विशेष में रुचि भी रखता है या नहीं या माता पिता के दबाव के कारण वह मेडिकल ,इंजीनियरिंग की कोचिंग हेतु प्रवेश के लिए आया है। गांधी मानते है कि आत्महत्या का उम्र से कोई संबंध नहीं है ,अधिकतर बच्चे आत्महत्या गलत मित्र संगति ,अरुचिकर क्षेत्र विशेष में लगातार मानसिक पारिवारिक सामाजिक दबाव असंगत अपेक्षा से और कुछ हद तक माता पिता द्वारा दैनिक रोजमर्रा की जिंदगी के व्यस्ततम शेड्यूल से अपने बच्चे से बेहतर संवाद स्थापित न कर पाना है ,उच्च स्तरीय कोचिंग इंस्टीट्यूट व्यावसायिक नहीं पारमार्थिक रूप से भी जरूरतमंद गरीब प्रतिभावान बच्चों को आज भी एक प्रतियोगी परीक्षा द्वारा निःशुल्क प्रवेश देते आए है ,आज प्रतियोगी माहौल जरूर बना है परंतु कोचिंग संस्थानों को जो दिन रात  बच्चों के लिए हर संभव तैयार रहते हैं को कुछ चुनिंदा आत्महत्या के लिए एकमात्र दोषी कोचिंग संस्थानों को ठहराना गलत है ,माता पिता समाज विद्यालय की बच्चों के सर्वांगीण विकास में भूमिका महत्वपूर्ण है जिसे दरकिनार नही किया जा सकता है।
हर कोचिंग के लिए प्रवेश से पूर्व गांधी मानते है कि स्टूडेंट पर्सनैल्टी ट्रेट ,पेरेंटिंग सोसाइटी एक्सपेक्टेशन बेस्ड महत्वपूर्ण प्रश्नों युक्त मनोवैज्ञानिक परीक्षा इस दिशा में एक विचारणीय कदम हो सकता है ,जिससे कोचिंग इंडस्ट्री में बहुत बड़ा बूम आ सकता है ,क्योंकि कुछ समय से कई वर्षों से असंगत रूप से राजस्थान के कोचिंग हब कोटा ही नहीं ,सीकर एवं अन्य जगह आत्महत्या के मामले बढ़ने लग गए थे जिसमें अधिकतर आत्महत्याओं का कारण पेरेंट्स की अनदेखी ,संवाद की कमी और बच्चों से असीमित अपेक्षा और कुछ स्टूडेंट्स की गलत संगत आदतें मुख्यत कारण थी। 

 आलोचना नहीं, सहयोग का समय
'राजस्थान कोचिंग केंद्र (नियंत्रण और विनियमन) विधेयक, 2025' एक आदर्श कानून नहीं हो सकता, लेकिन यह निश्चित रूप से एक ईमानदार और सही दिशा में उठाया गया कदम है। यह एक जटिल समस्या का व्यावहारिक समाधान खोजने का प्रयास करता है, जिसमें सभी हितधारकों संस्थान, छात्र और अभिभावक की भूमिका को स्वीकार किया गया है।
कोचिंग उद्योग राजस्थान की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और लाखों लोगों को रोजगार देता है। इस विधेयक का उद्देश्य इस उद्योग को खत्म करना नहीं, बल्कि इसे एक नैतिक और जवाबदेह ढांचे के भीतर फलने-फूलने में मदद करना है। राजस्थान सरकार ने निजी क्षेत्र के योगदान को स्वीकार करते हुए, छात्र कल्याण को प्राथमिकता देकर एक सराहनीय संतुलन हासिल किया है।
यह आलोचना करने का नहीं, बल्कि इस कानून के सफल कार्यान्वयन में सहयोग करने का समय है। यह एक शुरुआत है, और समय के साथ इसमें और सुधार किए जा सकते हैं। लेकिन एक अनियंत्रित उद्योग पर लगाम कसने, वित्तीय पारदर्शिता लाने और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के लिए भजनलाल सरकार की इस पहल की सराहना की जानी चाहिए। यह विधेयक एक खोया हुआ अवसर नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत का प्रतीक है।