विगत दिनांे पेपर में यह खबरें बहुतायत से प्रिन्ट हुई कि राजनैतिक गलियारे में उठाई गई राजगढ़ जिले की झगडा, नातरा प्रथा एवं बाल विवाह जैसी समस्याओं पर कई जगह वाहन रैली और पैदल मार्च निकाले गये जिनमें आम जनता से इन कुप्रथाओं को समाप्त करने का आवाहन भी किया गया।

आइये अब हम विचार करे कि राजगढ़ जिले और राजस्थान के अनेकों हिस्सों में सदियों से पैर फैलाये आम जन मानस के मनो मस्तिष्क में छाई इन कुप्रथाओं पर इन रैलियों से लगाम लग पायेगी । शायद नहीं

 

            यह बिल्कुल सही और तार्किक है कि ये तीनों प्रथाओं ऐसी है जिनमें आधी आबादी की हिस्सेदार महिलाओं का न केवल मानसिक बल्कि शारीरिक शोषण भी होता है । महिलायें भी अपने परिवार और समाज में चली आ रही कुप्रथाओं को बचपन से देखती है और उनकी आयु के 12-13 वर्ष पूर्ण होने तक इन प्रथाओं से गुजरने हेतु मानसिक रूप से पूरी तरह परिपक्व भी हो जाती है वैसे तो इस श्रेणी के लोग इन प्रथाओं और इनकी प्रक्रिया से पूर्णतः परिचित है किंतु मेरा यह लेख दूसरे जिले के लोग भी पढेगे तो उनकी सुविधा और समझ हेतु इन कुप्रथाओं को समझना और समझाना भी आवश्यक है।

 

बाल विवाह

            बाल विवाह यह प्रथा एक ऐसी प्रथा है जिससे लगभग सभी लोग परिचित हैं । हमारे देश में विवाह हेतु पुरूष स्त्री की आयु कानूनी रूप से तय की गई है। 21 वर्ष से कम आयु के पुरूष और 18 वर्ष से कम आयु की स्त्री का विवाह अनुष्ठान बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम के तहत दण्डनीय अपराध है।

 

नातरा प्रथा-

            यह प्रथा ऐसी है जिसमें विवाहित और अविवाहित दोनों स्त्रियों को शोषण होता है ।

1- एक विवाहित महिला को यदि कोई पुरूष भगाकर ले जाता है तो पहला पुरूष दूसरे पुरूष से और लडकी के पिता से झगडे की राशि के रूप में एक मोटी रकम की मांग करता है । यह मांग मोखिक रूप से और चिट्ठी भेजकर भी की जाती है । यदि राशि भुगतान में देरी होती है तो पहला पुरूष दूसरे पुरूष और लडकी के पिता के गांव में जाकर दूसरे लोगों की फसल और खेत में रखे हुए गोबर के कंडे, लकडी सिंचाई के पाईप भूसा आदि जलाकर नुकसान करता है जिससे गांव के दूसरे व्यक्ति जिसका नुकसान होता है वह दूसरे पुरूष अथवा लडकी के पिता को जल्दी पैसे का भुगतान करने का दबाव बनाता है ।

2- इस प्रथा में लडकियॉं भी बचपन से इस माहौल को देखती है तो वह भी बिना अपना अहित जाने हुए मानसिक रूप से इस प्रथा से गुजरने हेतु तैयार रहती हैं ।

3- यदि लडकी के पति के द्वारा लडकी को अच्छे से नहीं रखा जाता तो वह दूसरे अपने संपर्क वाले पुरूष के द्वारा की मीठी मीठी बातों और प्रदर्शित की गयी सहानुभूति प्रेरित होकर उसके साथ चली जाती है जिससे भी उसके पति को दूसरे पुरूष से और लडकी के पिता से झगडे की राशि मांगने का आधार बन जाता है । ऐसे पुरूष जिनकी पत्नि ऐसे दूसरे पुरूष के साथ भाग जाती है तो वह पति भी खुश रहता है कि उसे झगडे के रूप में रूपये मिल जायेगें ।

4-कुछ समय बाद झगडा राशि लेने के बाद वह पति भी किसी दूसरी विवाहित स्त्री या लडकी को भगा कर ले जाता है और पहली पत्नी का झगडा दूसरे पुरूष या लडकी के पिता को दे देता है ।

5- क्षेत्र में प्रचलित बाल विवाह के कारण यदि लडकी समझदार होने के बाद उस पुरूष को पसंद नहीं करती जिससे उसका बाल विवाह हुआ था तो तब उस लडकी के मना करने के बाद झगडा राशि की मांग की जाती है ।

6- क्षेत्र में प्रचलित बाल विवाह के कारण यदि लडकी पढ लिखकर योग्य बन जाती है और वह पुरूष जिससे उसका बाल विवाह तय हुआ था वह उसकी तुलना में पूर्ण रूपेण अयोग्य रहता है तब भी विवाह से मना करने पर झगडा राशि की मांग शुरू हो जाती है और अयोग्य होते हुए पुरूष को मोटी रकम प्राप्त हो जाती है ।

7-इस तरह से झगडे की राशि लेकर महिलाओं का शोषण होता रहता है जो पुरूष उन्हें भगाकर ले जाता है उसके उस स्त्री के  साथ कोई भी भावनात्मक संबंध नहीं होते हैं और केवल शारीरिक आकर्षण ही इस कुप्रथा के केन्द्र में रहता है । स्त्री की युवावस्था ढलने के साथ उस पुरूष की प्रताडना से भी उस स्त्री को गुजरना पडता है ।

8-इसी प्रथा के कारण क्षेत्र में बाल विवाह की प्रवृत्ति बढ रही है जिसमें लडकी के बाल्यावस्था में ही उसका विवाह कर दिया जाता है और फिर आना गोना करके उसे 17-18 साल की उम्र में ससुराल भेजा जाता है । इस बीच यदि कोई अन्य पुरूष उस स्त्री से विवाह कर लेता है तो फिर वही ंझगडे की प्रथा और पेैसो का लेन देन शुरू हो जाता है ।

प्रत्यक्ष उदाहरण:- हमने राजगढ़ न्यायालय में कार्य करने के दौरान एक केस में ऐसा भी देखा है कि एक लडकी जिसका बाल्यावस्था में विवाह तय कर दिया गया था उसका बाद में किसी दूसरे लडके से प्रेम संबंध होने के बाद उस लडके से उस लडकी के शारीरिक संबंध भी बन गये किन्तु उसने उस लडकी से विवाह नहीं किया जिसके फलस्वरूप लडकी ने उस लडके के विरूद्ध बलात्संग की रिपोर्ट इस उम्मीद पर कर दी कि जेल जाने के भय से शादी कर लेगा किन्तु उस लडके के पास पैसे न होने के कारण वह जेल भी गया और लंबी अवधि जेल में बिताने के बाद वह कोर्ट से बरी हुआ इस प्रकरण में फरियादी लडकी ने हाई कोर्ट में अपील कर दी और फिर उस लडके के विवाह के संबंध में समाज की पंचायत भी हुई वह लडका शादी भी करना चाहता था परंतु झगडा राशि के कारण दो प्रेमी युगल विवाह बंधन में नहीं बंध पाये और आज भी दोनों अविवाहित रहते हुए अपना अपना जीवन यापन कर रहे हैं ।

 

नातरा विवाह-  इस प्रथा में यदि किसी महिला की ससुराल से उसे प्रताडना के कारण या लडाई झगडे के कारण अपने मायके आकर रहना पडता है या उस महिला के पति का निधन हो जाता है । तो उस महिला का पिता किसी दूसरे पुरूष से लंबी रकम लेकर उसे दूसरे पुरूष के साथ भेज देता है इसे स्थानीय भाषा में नातरा विवाह कहा जाता है । यदि महिला के पति की मृत्यू हो चुकी होती है तो उसके ससुराल वाले दूसरे विवाह का झगडा मांगते हैं । पिता को अपनी पुत्री के दूसरे विवाह करने के लिए लंबी रकम इस कारण लेना पडती है कि उसके पति को जैसे ही पता चलेगा कि उसकी पत्नी का दूसरी जगह विवाह हो गया है तो वह लडकी के पिता से झगडे के पैसों की मांग करेगा । जिसे लडकी के पिता को देना भी पडेगी । लडकी के पिता को उस समय यह ज्ञात नहीं होता है लडकी के पति का कितना रूप्या झगडे का देना पडेगा इस लिए चाहकर भी शादी के रीति रिवाज नहीं कराये जाते क्योंकि उनमें पैसा खर्च होगा । इस कुप्रथा में भी महिलाओं का शोषण होता है , और एक पिता अपनी पुत्री के एक विवाह के असफल होने के बाद भी उसका दूसरा विवाह करने के बारे में दस बार सोचता है फिर मजबूरी में नातरा विवाह करता है ।

                  इस प्रकार यह दोनों कुप्रथायें निरंतर चलने वाली बुराईयॉं हैं जिनसे पूरे क्षेत्र की जनता त्रस्त हैै और निरंतर महिलाओं का शारीरिक और मानसिक शोषण हो रहा है । राजगढ़ जिले में दांगी, गुर्जर, सौधिया और तंवर समाज के लोगों में यह तीनों कुप्रथायें आम तौर पर बहुत प्रचलित है । इन कुप्रथाओं का मूल उद्गम स्थल राजस्थान के पिछडें हुए इलाके थे राजगढ़ जिला राजस्थान का सीमावर्ती जिला है जिसमें यह प्रथायें धीरे धीरे कर अपनी जडे जमा चुकी हैं । राजस्थान में तो अब इन कुप्रथाओं में काफी कमी आ गयी है किन्तु राजगढ़ में अभी भी यह कुप्रथायें पूर्ण रूपेण प्रचलित हैं और इनके कारण होने वाले दुष्प्रभार तथा उनसे उत्पन्न आपराधिक प्रकरणों में निरंतर बढोत्तरी हो रही है जो अत्यन्त चिंताजनक है।

। 

          उपरोक्त प्रथाओं में महिलाओं के पति,  पिता अथवा मंगेतर जो राशि वसूल करने की प्रक्रिया में पीडित होते हैं के द्वारा अवैध राशि मांगने की शिकायत पुलिस में की जाती है। इसी प्रकार आगजनी की शिकायतें भी पुलिस में की जाती है। जिस पर संबंधित थाना में EXTORTION और Mischief के अपराध भी पंजीबद्ध किये जाते हैं। अपराध कायम होते ही अभियुक्तगण की ओर से राजीनामा करने की पहल की जाती है और अपनी नाजायज मांग में से कुछ धनराशि कम देने पर फरियादी द्वारा राजीनामा किया जाता है, और न्यायालय में विचारण के दौरान अपने बयान और रिपोर्ट से फरियादी मुकर जाता है। इस प्रकार शोषण की प्रतिपूर्ति पूर्ण हो जाती है । इस पूरी प्रक्रिया में कानून तथा न्यायिक प्रक्रिया को खुले आम दुरूपयोग होता है और न्यायालय की गरिमा को गम्भीर रूप से आघात पहुंचता है।

 

                 राजगढ़ जिले की उपरोक्त कुप्रथाओं के कारण महिलाओं का लगातार मानसिंक एवं शारीरिक शोषण होता है जो मुस्लिम धर्म की तीन तलाक और हलाला से किसी भी स्तर पर कम नहीं है । इन कुप्रथाओं को नियं़ि़त्रत करने में न्याय पालिका का अभूतपूर्व योगदान हो सकता है । यदि राजगढ़ जिले में विधि व्यवसाय करने वाले अधिवक्तागण, शासकीय अधिवक्तागण और फरियादी की ओर से न्यायालय में अभियोजन कार्यवाही में भाग लेने वाले अधिवक्तागण अपने विधि व्यवसाय में पहल करें और निम्नानुसार कार्यवाही न्यायालयों से कराया जाना सुनिश्चित करें, तो यह प्रथायें नियंत्रित हो सकती है:-

1- फरियादी के पक्ष विरोधी हो जाने पर अधिवक्ता और न्यायिक अधिकारी को लोक सेवक के  द्वारा अपने सम्यक कर्तव्यों के निर्वाहन में ली गई एफआईआर कथन, नुकसानी पंचनामा, और घटना के समय लिये गए फोटोग्राफ्स की विश्वसनीयता को जांचने उपरांत उनके सही और लोकसेवक के द्वारा शासकीय कर्तव्यों के विधि पूर्ण निर्वाहन में संपादित विधिक कार्यवाही पर विश्वास करके अभियुक्तगणों को दण्डित करना चाहिए। ताकि कानून तथा न्यायिक प्रक्रिया के खुले आम दुरूपयोग को रोका जा सके और न्यायालय की गरिमा को विधिवत बनाये रखा जा सके ।

2- फरियादी यदि विचारण में माननीय न्यायालय के समक्ष अपने शपथ पर किए गये कथनों में थाने पर रिपोर्ट करने से इंकार करता है । अपने हस्ताक्षर अथवा अंगूठा निशान को भी अस्वीकार करता है ।  इसी प्रकार अनुसंधान के दौरान अनुसंधान कर्ता अधिकारी के द्वारा जो नुकसानी पंचनामा साक्षियों की उपस्थिति में तैयार किया था उस पर भी अपने हस्ताक्षर होने से फरियादी/रिपोर्टकर्ता इंकार करता है तो न्यायालय में पीठासीन न्यायाधीश महोदय की उपस्थिति के हस्ताक्षर करवाकर उन हस्ताक्षरों से प्रथम दृष्टया रिपोर्ट और नुकसानी पंचनामा पर किए गये हस्ताक्षरों से मिलान होने पर उसके विरूद्ध न्यायालय में शपथ पर मिथया कथन करने के आरोप में उन्हें अभियोजित करवाने की कार्यवाही करना चाहिए।

             यदि झगडा नातरा बालविवाह से उत्पन्न ऐसे आपराधिक प्रकरणों में फरियादी के मुकरने पर उपरोक्तानुसार कार्यवाही की जाती है तो शनैःशनैः इन कुप्रथाओं को नियंत्रित किया जा सकता है । साथ ही हमारे न्याय के मंदिर और उनमें बैठे हुए हमारे न्यायालयों की गरिमा को भी प्रतिदिन पहुंचने वाले आघात से रोका जा सकेगा ।  झगडा नातरा की इन कुंप्रथाओं से अवैध रूप से आर्थिक लाभ अर्जित करने वाले लोगों द्वारा सतत रूप से किए जा कानून तथा न्यायिक प्रक्रिया के दुरूपयोग को भी रोका जा सकेगा, क्योंकि कानून और न्याय प्रशासन कभी भी किसी भी कीमत पर किसी के हाथों की कठपुतली नहीं हो सकता है । 

 

आलोक कुमार श्रीवास्तव

जिला अभियोजन अधिकारी

राजगढ़