भैंसवा माताजी के दिव्य और चमत्कारिक स्थान पर जन सहयोग से 25 करोड़  की लागत से चार चरणों में मन्दिर निर्माण का कार्य चल रहा है, प्रथम चरण में माँ के गर्भगृह का निर्माण कार्य किया जा रहा है। माँ के  भव्य दरबार को सजाने में आमजन की भी मेहनत की कमाई लग सके इस हेतु समिति सदस्य गाँव गाँव जाकर धन और अन्न का संगृह कर रहे है। यज्ञ  को निमित्त बनाकर पर्यावरण सुधार , धार्मिक ज्ञान एवं मन्दिर का निर्माण करना समिति का लक्ष्य है। 
नवरात्री के  प्रथम दिन रविवार को अरनिया जोड़  पर सेकडों कलश की पूजा अर्चना राज्य मंत्री गोतम टेटवाल, सांसद रोड़मल  नागर, मुख्य यजमान अनिल जी, जनपद अध्यक्ष देवनारायण नागर, स्थानीय सरपंच कुलदीप नागर  ने  यज्ञ में बैठे यजमानो के  साथ करके भव्य   कलश यात्रा  का  शुभारम्भ किया। सेकडो महिलायें माँ के  जयकारे लगाने  के साथ ही मंगल गीत गाते हुए कलश यात्रा में चल रही थी|  कलश यात्रा के माध्यम से जल की उपयोगिता और जल  संवर्धन का महत्व बताते हुए  जल की फिजूल। खर्ची रोकने का भी संदेश दिया जा रहा था। कलश यात्रा का  जगह जगह स्वागत होते हुए दो किलोमीटर का मार्ग तय कर बीजासन के प्रांगण  में पंहुचने पर समापन हुआ। 
यज्ञाचार्य पंडित इंद्रजीत  पाराशर ने   यज्ञशाला में स्थापित और ग्राम देवता का आह्वान कर  यजमानों से वैदिक मंत्रो के उच्चारण के साथ पूजा अर्चना करवाकर यज्ञ  का महत्व बताया।  यज्ञशाला में बनाये गये 108  कुंडो में यजमान जन देवताओ के निमित्त  घी और साकलय की   आहुतियाँ देकर अपने जीवन को धन्य कर रहे है।  शाम के समय यज्ञ भगवान की यजमान  जन द्वारा सामूहिक आरती उतारकर यज्ञशाला में  हरि कीर्तन करते हुए परिक्रमा  ली गयी।  यज्ञ भगवान  की  परिक्रमा करने से पापों का नाश होता है और जीवन में सुख, शांति,  वेभव की प्राप्ति होती है। 
श्री राम कथा मर्मज्ञ पंडित श्याम मनावत ने कहा की आज  ही के दिन गुड़ी पड़वा  पर बृह्मा जी ने इस सृष्टि की रचना की थी इसलिये इस दिन को सिर्फ हिंदू  अपना नववर्ष न समझे।  यह नववर्ष  धरती पर रहने वालो सभी प्राणियों का दिन है। सनातन धर्म सबके कल्याण  के  भाव रखता है, हम सारी सृष्टि को वसुदेव कुटुंब के रूप में देखते है  अतः इस  धरती और रहने वाले सभी मनुष्य सनातनी है। राज दशरथ ने राम को वन जाने के लिये कभी नहीं बोला, किंतु राम सिर्फ  पिता की इच्छा को समझकर ही वन के  लिये  प्रस्थान कर गये। केवट के द्वारा राम, सीता और लक्ष्मण को गंगा   पार कराने के बाद  राम के पास केवट का मेहनताना देने के लिये कुछ नहीं था। माँ जगतजननी सीता ने अपने पति के बिना कहे ही अपनी अंगूठी उतारकर राम को केवट को देने के लिये दे दी। हमें राम और सीता के जीवनचरित्र से यह शिक्षा लेना चाहिये की हमारे प्रियजन के मनोभाव को समझकर ही हर परिस्थिति का सामना  करें, कहने का रास्ता नहीं देखें  क्योंकि  कभी कभी व्यक्ति  कितनें  भी संकट में हो पर संकोच बस कह नही पाता है।