ब्रेकिंग
♦ डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के व्यवहारिक भूविज्ञान विभाग के प्रो. अथोकपम के. सिंह वर्ष 2026 के लिए विश्व के शीर्ष 2% वैज्ञानिकों में शामिल* ♦ कचरे का पृथक्करण पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम : प्रो. पी. के. जैन* ♦ 12 घंटे के भीतर दोनों बालकों को दस्तयाब कर परिजनों को सुरक्षित सुपुर्द किया गया* ♦ बैटरी डिस्चार्ज होने से रास्ते में फँसे दिव्यांग तीर्थयात्रियों की सहायता कर सुरक्षित पहुँचाया गंतव्य तक* ♦ साहू समाज राजगढ़ ने निकाली भव्य ध्वज यात्रा, मां जालपा से की नगर की सुख-समृद्धि की कामना* ♦ गायत्री शक्तिपीठ विज्ञान नगर में श्राद्ध तर्पण पूजन संपन्न, पंच महायज्ञों से पंच ऋणों की मुक्ति का दिया संदेश*
समाचार खोजें
प्रमुख श्रेणियां:
ताज़ा ख़बरें राजनीति मनोरंजन खेल व्यापार देश-दुनिया क्राइम टेक्नोलॉजी

डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के व्यवहारिक भूविज्ञान विभाग के प्रो. अथोकपम के. सिंह वर्ष 2026 के लिए विश्व के शीर्ष 2% वैज्ञानिकों में शामिल*

इस खबर को ऑडियो में सुनें (Listen News)
शेयर करें:
WhatsApp Share Post
डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के व्यवहारिक भूविज्ञान विभाग के प्रो. अथोकपम के. सिंह वर्ष 2026 के लिए विश्व के शीर्ष 2% वैज्ञानिकों में शामिल*

*


*विश्व में भूविज्ञान के क्षेत्र में 116 वां स्थान किया हासिल, देश में महत्वपूर्ण योगदान के लिए एस. एम. नकवी स्वर्ण पदक - 2025 से भी जा चुका है नवाजा* 


      *सागर (मध्यप्रदेश)।* डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश के व्यवहारिक भूविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष एवं वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के पूर्व वैज्ञानिक-एफ, प्रो. अथोकपम कृष्णकांत सिंह ने स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय, अमेरिका के सहयोग से एल्सेवियर द्वारा तैयार की गई प्रतिष्ठित वैश्विक रैंकिंग में वर्ष 2026 के लिए विश्व के शीर्ष 2% वैज्ञानिकों में स्थान प्राप्त कर एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। अपनी इस उपलब्धि को और भी खास बनाते हुए, उन्होंने भूविज्ञान के क्षेत्र में 116वीं वैश्विक सबफील्ड रैंक हासिल की है, जो भूविज्ञान के क्षेत्र में उनके शोध योगदान के प्रभाव और महत्व को दर्शाती है।  

     यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रो. सिंह की निरंतर शोध उत्कृष्टता, वैज्ञानिक अन्वेषण के प्रति समर्पण और वैश्विक भूवैज्ञानिक समुदाय में उनके बहुमूल्य योगदान को रेखांकित करता है। यह उपलब्धि डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय और इसके शैक्षणिक वर्ग के लिए अत्यधिक गर्व का विषय है, जिससे अनुसंधान एवं शैक्षणिक उत्कृष्टता के क्षेत्र में विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ी है।  

     प्रो. सिंह का विशिष्ट शैक्षणिक एवं अनुसंधान करियर उल्लेखनीय उपलब्धियों, प्रतिष्ठित फेलोशिप और भूविज्ञान क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदानों से सुसज्जित है। उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, हरियाणा से व्यवहारिक भूविज्ञान में एम.एससी. की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद, उसी विश्वविद्यालय से 'विश्वविद्यालय अनुसंधान छात्रवृत्ति' (यूआरएस) प्राप्त कर, उन्होंने एनोरोजेनिक कॉम्प्लेक्स में ए-टाइप मैग्माटिज्म के पेट्रोजेनेसिस और भू-गतिशील विकास तथा दुर्लभ-धातु खनिजीकरण की संभावनाओं पर शोध करते हुए अपनी पीएच.डी. की उपाधि अर्जित की। अपने पीएच.डी. शोध कार्य के दौरान उन्हें वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर), नई दिल्ली द्वारा 'वरिष्ठ अनुसंधान फेलोशिप' (एसआरएफ) भी प्रदान की गई। इसके तत्पश्चात, उन्हें भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) द्वारा प्रतिष्ठित बैटर अपॉर्च्युनिटीज फॉर यंग साइंटिस्ट्स इन चोजन एरियाज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (BOYSCAST) फेलोशिप से सम्मानित किया गया, जिसके माध्यम से उन्होंने इंग्लैंड के मिल्टन कीन्स स्थित द ओपन यूनिवर्सिटी में अपना पोस्ट-डॉक्टोरल शोध कार्य पूरा किया। आग्नेय पेट्रोलॉजी और भू-रसायन में उनके उत्कृष्ट योगदान के सम्मान में, उन्हें जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया, बेंगलुरु द्वारा अत्यंत प्रतिष्ठित एस. एम. नकवी स्वर्ण पदक - 2025 पुरस्कार से सम्मानित किया गया।  

     प्रो सिंह ने एक दर्जन से अधिक पीएच.डी. शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया है और कई पोस्ट-डॉक्टरल फेलो का मार्गदर्शन किया है। इसके साथ ही उन्होंने प्रतिष्ठित राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं लिथोस, गोंडवाना रिसर्च, प्रीकैम्ब्रियन रिसर्च, जियोसाइंस फ्रंटियर्स, कॉन्ट्रिब्यूशन्स टू मिनरलॉजी एंड पेट्रोलॉजी, जियोकेमिस्ट्री, इंटरनेशनल जियोलॉजी रिव्यू तथा मिनरल्स आदि में 100 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित किए हैं, जिससे आग्नेय पेट्रोलॉजी, भू-रसायन, भू-कालक्रम, खनिजकरण और हिमालयन टेक्टोनिक्स में महत्वपूर्ण योगदान मिला है। उनका शोध महाद्वीपीय टकराव, सबडक्शन और आब्डक्शन जैसी प्रक्रियाओं के दौरान महाद्वीपीय एवं महासागरीय भूपर्पटी तथा लिथोस्फेरिक मेंटल के जियोडायनामिक्स इवोल्यूशन को समझने पर केंद्रित है, जिसके लिए वे संपूर्ण-चट्टान भू-रसायन, खनिज रसायन, समस्थानिक अध्ययन और यूरेनियम-लेड जियोक्रोनोलॉजी जैसे एकीकृत दृष्टिकोण का उपयोग करते हैं।  

     उनका शोध क्रोमाइट्स और मेंटल पेरिडोटाइट्स में निकिल-काॅपर-प्लेटिनम ग्रुप एलिमेंट्स भू-रासायनिक विशेषताओं की जांच के साथ-साथ फेल्सिक, मैफिक और मेंटल से उत्पन्न अल्ट्रामैफिक चट्टान प्रणालियों में दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और दुर्लभ धातुओं सहित महत्वपूर्ण तत्वों के खनिजकरण तक विस्तृत है। उन्होंने प्रमुख सूचर जोन्स, विशेष रूप से हिमालय और पूर्वोत्तर भारत के भारत-म्यांमार ओरोजेनिक बेल्ट में ओफियोलाइट निर्माण के दौरान मेंटल की भौतिक और रासायनिक स्थितियों की भी खोज की है। उन्होंने एनो्रोजेनिक मैग्मैटिज्म, विशेष रूप से पश्चिमी प्रायद्वीपीय भारत के मालानी इग्नीयस सूट का भी अध्ययन किया है, जो नियोप्रोटेरोजोइक रोडिनिया महाद्वीप के विघटन से जुड़ा हुआ है। ये अध्ययन टेक्टोनिक प्रक्रियाओं, मेंटल विकास और भारतीय शील्ड के भू-गतिशील इतिहास की व्यापक समझ में योगदान देते हैं।  

    अपनी शोध उपलब्धियों के अलावा प्रो. सिंह अंतर्राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक प्रकाशन समुदाय में जॉन विली एंड संस की 'जियोलॉजिकल जर्नल' के एसोसिएट एडिटर के रूप में एक महत्वपूर्ण पद संभालते हैं। जहाँ वे विद्वतापूर्ण प्रकाशन की उन्नति और उच्च गुणवत्ता वाले भूवैज्ञानिक अनुसंधान के प्रसार में योगदान दे रहे हैं। उनके अनुसंधान को व्यापक अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिली है, जिसके प्रमुख पीर-रिव्यूड जर्नल्स जैसे अर्थ साइंस रिव्यू, लिथोस, गोंडवाना रिसर्च, प्रीकैम्ब्रियन रिसर्च, जियोसाइंस फ्रंटियर्स, इंटरनेशनल जियोलॉजी रिव्यू आदि में हजारों साइटेशन्स दर्ज हैं।  

     उनका शैक्षणिक नेतृत्व डॉक्टरेट और पोस्ट-डॉक्टोरल शोधकर्ताओं को मार्गदर्शन देने के साथ-साथ ओवरऑल लैब इंचार्ज और आईसीपी-एमएस लैब, एसईएम लैब, एक्सआरडी लैब एवं एक्सआरएफ लैब सहित विभिन्न प्रयोगशालाओं के साइंटिस्ट-इन-चार्ज के रूप में विश्लेषणात्मक इंस्ट्रूमेंटेशन सुविधाओं की देखरेख तक फैला हुआ है। इसके अलावा, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून में अपने कार्यकाल के दौरान 2014 में जियोक्रोनोलॉजी लैब (एलए- एमसी-आईसीपीएमएस लैब) की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वर्तमान में, डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में व्यावहारिक भूविज्ञान विभागाध्यक्ष, डिप्टी प्रॉक्टर, 'मध्य भारती: जर्नल ऑफ साइंस' के संपादक और प्रवेश प्रकोष्ठ (2026-27) के मुख्य समन्वयक के रूप में, वे शैक्षणिक, प्रशासनिक एवं संस्थागत विकास के साथ-साथ भूविज्ञान अनुसंधान की प्रगति में अपना महत्वपूर्ण निरंतर योगदान दे रहे हैं।