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जनसंघ के 75 वर्ष पर राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का ऐतिहासिक संबोधन - सत्ता नहीं, विचार जीता है

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जनसंघ के 75 वर्ष पर राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का ऐतिहासिक संबोधन - सत्ता नहीं, विचार जीता है





विचारों की निरंतरता, संगठन की शक्ति और राष्ट्र प्रथम की भावना ने भारतीय जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी तक की यात्रा को दी नई पहचान


✍️ डॉ. नयन प्रकाश गांधी पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट ,मैनेजमेंट विश्लेषक 


कल दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर स्थित भाजपा मुख्यालय का दृश्य ऐतिहासिक था। भारतीय जनसंघ की स्थापना के 75 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित विशेष वैचारिक संगोष्ठी में जब भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नितिन नबीन ने संबोधन दिया तो वह केवल एक भाषण नहीं था, वह 75 साल के तप, त्याग और संघर्ष का जीवंत दस्तावेज था।भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ यात्राएँ केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं होतीं, बल्कि वे विचारों, सिद्धांतों और संगठनात्मक संकल्प की दीर्घकालीन यात्रा का प्रतिनिधित्व करती हैं। भारतीय जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी तक का सफर इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। वर्ष १९५१ में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा स्थापित भारतीय जनसंघ के सामने उस समय राजनीतिक चुनौतियाँ कम नहीं थीं। देश स्वतंत्रता के बाद नव निर्माण की प्रक्रिया से गुजर रहा था और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का राजनीतिक वर्चस्व स्थापित था। ऐसे वातावरण में जनसंघ ने राष्ट्र की एकता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय स्वाभिमान को केंद्र में रखकर अपनी वैचारिक पहचान विकसित की।जनसंघ की स्थापना का महत्व केवल एक नए राजनीतिक दल के उदय में नहीं था। इसका महत्व उस वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टिकोण में था, जो भारत की सांस्कृतिक विरासत, राष्ट्रीय एकात्मता और नागरिक कर्तव्यों को सार्वजनिक जीवन के केंद्र में देखना चाहता था। उस समय संसाधनों और सत्ता की दृष्टि से सीमित होने के बावजूद संगठन ने कार्यकर्ताओं के परिश्रम और विचारधारा के आधार पर अपना विस्तार किया। यही कारण है कि जनसंघ से भाजपा तक की यात्रा भारतीय लोकतंत्र के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गई है।


सत्ता से अधिक महत्वपूर्ण विचार की निरंतरता

राजनीति में सत्ता प्राप्त करना किसी भी दल का स्वाभाविक लक्ष्य हो सकता है, लेकिन दीर्घकालीन राजनीतिक प्रभाव के लिए विचारों की स्पष्टता और संगठन की निरंतरता आवश्यक होती है। जनसंघ ने अपने शुरुआती वर्षों में इसी चुनौती का सामना किया। सीमित संसाधनों के बीच कार्यकर्ताओं ने जनसंपर्क, वैचारिक संवाद और संगठन निर्माण के माध्यम से अपनी उपस्थिति बढ़ाई।वर्ष १९७७ में जनता पार्टी के गठन के साथ जनसंघ की राजनीतिक यात्रा ने नया मोड़ लिया। वर्ष १९८० में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई। इसके बाद अनेक चुनावी उतार-चढ़ाव आए, लेकिन संगठन ने अपनी राजनीतिक यात्रा जारी रखी। इस इतिहास से स्पष्ट होता है कि लोकतंत्र में किसी विचारधारा का प्रभाव केवल तत्कालीन चुनावी सफलता से निर्धारित नहीं होता, बल्कि उसकी संगठनात्मक क्षमता, जनसमर्थन और समय के साथ स्वयं को बदलने की योग्यता भी महत्वपूर्ण होती है।


अटल, आडवाणी और विचार से जनसमर्थन तक का सफर

अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय राजनीति में संवाद, संसदीय मर्यादा और लोकतांत्रिक सहमति की महत्वपूर्ण मिसाल प्रस्तुत की। उनके व्यक्तित्व ने भाजपा को व्यापक राजनीतिक स्वीकार्यता दिलाने में योगदान दिया। लालकृष्ण आडवाणी ने संगठन विस्तार और राजनीतिक जनजागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने शिक्षा, सांस्कृतिक चेतना और वैचारिक विमर्श के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई।इन नेताओं की भूमिका को केवल किसी एक राजनीतिक उपलब्धि तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। संगठन निर्माण, जनसंपर्क, वैचारिक प्रशिक्षण और राजनीतिक संघर्ष की अनेक धाराओं ने मिलकर भाजपा को एक व्यापक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में स्थापित किया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद भी इस वैचारिक परंपरा का महत्वपूर्ण आधार रहा, जिसमें विकास को व्यक्ति, समाज और मानवीय गरिमा के साथ जोड़कर देखने पर बल दिया गया।


नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वैचारिक एजेंडे का विस्तार

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने राष्ट्रीय राजनीति में व्यापक जनादेश प्राप्त किए और अनेक महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लिए। जम्मू-कश्मीर से संबंधित संविधान के अनुच्छेद ३७० के अधिकांश प्रावधानों को निष्प्रभावी करना तथा अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण ऐसे विषय रहे, जिन्हें भाजपा की दीर्घकालीन वैचारिक यात्रा के संदर्भ में देखा जाता है।इन निर्णयों के राजनीतिक और सामाजिक प्रभावों का मूल्यांकन करते समय उनके समर्थकों की अपेक्षाओं के साथ-साथ संवैधानिक प्रक्रियाओं, सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक विमर्श को भी महत्व देना आवश्यक है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में उपलब्धियों की चर्चा के साथ नीतियों के परिणामों का निष्पक्ष आकलन भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।


प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति में संगठन, जनसंपर्क, कल्याणकारी योजनाओं और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर विशेष बल दिखाई देता है। राष्ट्र प्रथम की भावना तभी व्यापक सामाजिक विश्वास अर्जित कर सकती है, जब शासन की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, नागरिकों की समस्याओं का समाधान हो और संस्थाओं के प्रति जनविश्वास मजबूत बने।


नितिन नबीन के सामने नई जिम्मेदारियाँ

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के समक्ष संगठन की इस लंबी परंपरा को आगे बढ़ाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। संगठनात्मक अनुभव, कार्यकर्ताओं से संवाद और विभिन्न क्षेत्रों में राजनीतिक विस्तार की क्षमता किसी भी अध्यक्ष के लिए महत्वपूर्ण गुण हैं। लेकिन नेतृत्व की वास्तविक कसौटी केवल संगठन का विस्तार नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं की सक्रियता, जनसमस्याओं के प्रति संवेदनशीलता और जनता के विश्वास को बनाए रखना भी है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के सामने अपनी वैचारिक पहचान को समकालीन भारत की आकांक्षाओं से जोड़ने की चुनौती है। युवाओं के लिए रोजगार और कौशल विकास, किसानों की आय, महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा स्थानीय स्तर पर आधारभूत सुविधाएँ ऐसे विषय हैं, जिन पर राजनीतिक प्रतिबद्धता का मूल्यांकन होना चाहिए। राष्ट्र सेवा का विचार तभी सार्थक बनता है, जब वह नागरिकों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के रूप में दिखाई दे।


राष्ट्रवाद का अर्थ और लोकतांत्रिक मर्यादा

भारतीय परंपरा में सामूहिकता, सहअस्तित्व और कर्तव्य की भावना को विशेष महत्व दिया गया है। ऋग्वेद का मंत्र ‘संगच्छध्वं संवदध्वं’ मिलकर चलने और संवाद करने की प्रेरणा देता है। इसका व्यापक संदेश आज भी प्रासंगिक है। राष्ट्र निर्माण केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सहयोग, विश्वास और सहभागिता से आगे बढ़ता है।इसीलिए किसी राजनीतिक दल की उपलब्धियों का उल्लेख करते समय लोकतांत्रिक विपक्ष की भूमिका को नकारना उचित नहीं होगा। स्वस्थ लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है कि वे जनहित के प्रश्नों को प्राथमिकता दें। आलोचना तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए और शासन को भी प्रश्नों का उत्तर देने के लिए तत्पर रहना चाहिए। जनता का विश्वास आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि उत्तरदायी आचरण और ठोस कार्यों से अर्जित होता है।


भारतीय जनसंघ से भाजपा तक की ७५ वर्षों की वैचारिक यात्रा का व्यापक संदेश यही है कि संगठन की शक्ति, सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता और जनसंपर्क किसी भी राजनीतिक दल की पहचान को आकार देते हैं। कांग्रेस के ऐतिहासिक सत्ता वर्चस्व के दौर में जनसंघ ने वैकल्पिक विचार प्रस्तुत किया और समय के साथ भाजपा ने राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाया।


अंततः किसी भी विचारधारा की स्थायी सफलता का निर्णय केवल इतिहास की उपलब्धियों से नहीं, बल्कि वर्तमान की जिम्मेदारियों और भविष्य की दिशा से होता है। राष्ट्र के प्रति निष्ठा का सर्वोत्तम प्रमाण नागरिकों के अधिकारों का सम्मान, सामाजिक समरसता, सुशासन और जनकल्याण है। विचार तभी वटवृक्ष बनता है, जब उसकी जड़ें जनता के विश्वास में गहरी हों और उसकी छाया प्रत्येक नागरिक तक पहुँचे। यही किसी भी राजनीतिक यात्रा की सबसे बड़ी कसौटी है।