चार जिंदगियां नहर में समाईं, सवालों के घेरे में विसर्जन व्यवस्था! कोटा हादसे ने झकझोरा राजस्थान-अब तो जागे सरकार
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ओम बिरला का घटनास्थल पर पहुंचकर पीड़ित परिवारों और लोगों से मिलना संवेदनशील पहल, लेकिन हर साल होने वाले विसर्जन आयोजनों में सुरक्षा के स्थायी इंतजाम करना सरकार की जिम्मेदारी
✍️डॉ नयन प्रकाश गांधी मैनेजमेंट विश्लेषक पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट
कोटा की चंबल दायीं मुख्य नहर में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान नाव पलटने से चार युवकों के लापता होने की घटना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि हमारी विसर्जन व्यवस्थाओं और सुरक्षा इंतजामों पर गंभीर सवाल है। मां दुर्गा की आराधना, श्रद्धा और आस्था के साथ शुरू हुआ उत्सव अचानक मातम और बेचैनी में बदल गया। जिन घरों में त्योहार की खुशियां होनी चाहिए थीं, वहां अपनों की सलामती की दुआएं होने लगीं। नहर के गहरे पानी में लापता युवकों की तलाश करते गोताखोर और घटनास्थल पर अपनों की राह देखते परिजन इस त्रासदी की भयावहता को बयां कर रहे थे।यह समय केवल दुख व्यक्त करने का नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों पर गंभीरता से विचार करने का भी है, जिनके कारण ऐसे हादसों की आशंका बनी रहती है। आखिर कब तक धार्मिक आस्था के आयोजनों में सुरक्षा की अनदेखी होती रहेगी? आखिर कब तक किसी दुर्घटना के बाद प्रशासनिक अमला सक्रिय होगा और फिर समय बीतने के साथ व्यवस्थाएं पुराने ढर्रे पर लौट जाएंगी? राजस्थान सरकार को अब इस सवाल का स्थायी जवाब देना होगा।
संवेदनशीलता का संदेश: घटनास्थल पर पहुंचे ओम बिरला
कोटा नहर हादसे की सूचना मिलने पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का घटनास्थल पर पहुंचना और वहां मौजूद लोगों से मिलकर स्थिति की जानकारी लेना संवेदनशील पहल रही। उन्होंने बचाव अभियान तेज करने के निर्देश दिए और लापता युवकों की तलाश के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी ली। संकट की इस घड़ी में जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी प्रभावित परिवारों को यह भरोसा दिलाने का माध्यम बन सकती है कि उनकी पीड़ा को सुना जा रहा है और प्रशासन उनकी सहायता के लिए जुटा है।ऐसे समय में जब परिजन अपनों की सलामती की उम्मीद लगाए बैठे हों, तब संवेदना के शब्दों के साथ जमीन पर सक्रिय सहयोग भी जरूरी होता है। ओम बिरला सहित मौके पर पहुंचे जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के सामने सबसे पहली प्राथमिकता लापता युवकों की तलाश, बचाव दलों को जरूरी संसाधन उपलब्ध कराना और प्रभावित परिवारों को हरसंभव सहायता देना है। लेकिन इस घटना से जुड़ा बड़ा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है—क्या ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए पहले से पर्याप्त इंतजाम किए गए थे? किसी हादसे के बाद बचाव अभियान तेज करना आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि दुर्घटना की आशंका को पहले ही कम किया जाए।
आस्था के उत्सव में सुरक्षा से समझौता क्यों?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, कोटा में प्रतिमा विसर्जन के दौरान नाव का संतुलन बिगड़ने से वह नहर में पलट गई। हादसे में तीन लोग सुरक्षित बाहर निकल आए, जबकि चार युवक लापता हो गए। घटनास्थल पर नहर की गहराई लगभग 40 से 50 फीट बताई गई। ऐसी परिस्थितियों में नाव पर क्षमता से अधिक भार, प्रतिमा को पानी में झुकाने की प्रक्रिया, नाव की स्थिरता और सुरक्षा संसाधनों की उपलब्धता जैसे पहलुओं का महत्व और बढ़ जाता है। हादसे के वास्तविक कारणों की जांच के साथ इन सभी बिंदुओं की पड़ताल होनी चाहिए।सबसे चिंताजनक बात यह सामने आई कि जिस स्थान पर नाव के जरिए प्रतिमाओं का विसर्जन कराया जा रहा था, वह प्रशासन द्वारा निर्धारित विसर्जन घाट नहीं था। वहां पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था, गोताखोरों और बचाव दलों की पूर्व तैनाती नहीं होने की जानकारी भी सामने आई। यदि किसी स्थान पर हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग प्रतिमा विसर्जन के लिए पहुंचते हैं, तो वहां सुरक्षा व्यवस्था को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि वह आधिकारिक रूप से निर्धारित घाट नहीं है।प्रशासन की जिम्मेदारी केवल निर्धारित घाट घोषित करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। लोगों को सुरक्षित घाटों तक पहुंचाने, अनधिकृत स्थानों पर विसर्जन रोकने और खतरनाक जलक्षेत्रों में नावों के इस्तेमाल पर प्रभावी नियंत्रण की व्यवस्था भी आवश्यक है।
राजस्थान सरकार बनाए प्रतिमा विसर्जन के लिए स्पष्ट नियमावली
कोटा की घटना राजस्थान सरकार के लिए एक चेतावनी है। सरकार को पूरे प्रदेश के लिए प्रतिमा विसर्जन की एक स्पष्ट, व्यावहारिक और अनिवार्य नियमावली तैयार करनी चाहिए। यह व्यवस्था केवल कोटा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, अजमेर, बीकानेर और प्रदेश के अन्य बड़े शहरों के साथ उन सभी कस्बों और क्षेत्रों में लागू होनी चाहिए, जहां बड़े पैमाने पर प्रतिमा विसर्जन होता है। यही नही राजस्थान के बाद भारत सरकार द्वारा राष्ट्रिय स्तर पर इस हेतु सभी राज्यों में इस हेतु स्पस्ट नियमावली बने
नियमावली में निम्नलिखित व्यवस्थाएं अनिवार्य की जानी चाहिए—
पहला, पंजीकृत एवं सुरक्षा-संपन्न विसर्जन घाट: प्रत्येक शहर और प्रमुख कस्बे में जलस्तर, गहराई, पहुंच मार्ग तथा स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर सुरक्षित विसर्जन स्थलों को चिह्नित किया जाए। घाटों का पंजीकरण हो और सुरक्षा मानकों की नियमित जांच की जाए।
दूसरा, विसर्जन के दिनों में गोताखोरों की अनिवार्य तैनाती: प्रत्येक निर्धारित घाट पर विसर्जन अवधि के दौरान प्रशिक्षित गोताखोर, एसडीआरएफ अथवा अन्य अधिकृत बचाव दल की आवश्यक उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। किसी भी आपात स्थिति में मदद पहुंचने में देरी न हो, इसके लिए बचाव दलों की तैनाती और प्रतिक्रिया व्यवस्था पहले से तय हो।
तीसरा, नावों के संचालन पर सख्त नियंत्रण: नाव की क्षमता से अधिक लोगों को बैठाने पर रोक हो। नाव की स्थिति, संतुलन, लाइफ जैकेट और अन्य आवश्यक सुरक्षा उपकरणों की जांच की जाए। प्रतिमा विसर्जन के लिए नाव का इस्तेमाल तभी हो, जब संबंधित स्थान पर इसकी अनुमति हो और आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था मौजूद हो।
चौथा, घाटों पर पुलिस और आपातकालीन सेवाएं: विसर्जन के दौरान पर्याप्त पुलिसकर्मी, प्राथमिक उपचार, एंबुलेंस, प्रकाश व्यवस्था, बैरिकेडिंग और आपातकालीन संपर्क व्यवस्था उपलब्ध रहे। भीड़ प्रबंधन के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की तैनाती भी पहले से सुनिश्चित की जाए।
पांचवां, खतरनाक स्थानों पर विसर्जन पर प्रभावी रोक: गहरी नहरों, तेज बहाव वाले जलक्षेत्रों और असुरक्षित किनारों पर विसर्जन रोकने के लिए स्पष्ट प्रतिबंध और निगरानी हो। केवल आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं है; उनका पालन भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
छठा, जनजागरूकता और जवाबदेही: आयोजकों, समितियों और आम नागरिकों को विसर्जन से पहले सुरक्षित घाटों की जानकारी दी जाए। नियमों के उल्लंघन पर जिम्मेदारी तय हो और हर बड़े आयोजन के बाद सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की जाए।
मंत्री की अपील के साथ प्रशासन को भी उठाने होंगे ठोस कदम
शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने हादसे के बाद लोगों से अपील की कि वे प्रतिमाओं का विसर्जन केवल प्रशासन द्वारा निर्धारित घाटों पर ही करें। उन्होंने बताया कि विसर्जन के लिए किशोरपुरा घाट पर व्यवस्था की गई थी, जबकि दुर्घटना वाला स्थान निर्धारित घाट नहीं था।यह अपील महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि निर्धारित घाटों पर पर्याप्त क्षमता, सुगम पहुंच, प्रशिक्षित बचावकर्मी और आवश्यक सुरक्षा संसाधन उपलब्ध हों। लोगों से नियमों का पालन करने की अपेक्षा तभी प्रभावी होगी, जब उन्हें सुरक्षित विकल्प मिलें और उन विकल्पों की जानकारी समय रहते पहुंचाई जाए।प्रशासन को विसर्जन से पहले ही सार्वजनिक सूचना जारी करनी चाहिए कि कौन-कौन से घाट अधिकृत हैं, किन स्थानों पर जाना प्रतिबंधित है और आपात स्थिति में किससे संपर्क किया जाए। स्थानीय निकायों, पुलिस, आपदा प्रबंधन विभाग और आयोजक समितियों के बीच समन्वय भी पहले से निर्धारित होना चाहिए।
हादसे के बाद नहीं, हादसे से पहले सक्रिय हो व्यवस्था
कोटा की घटना में पुलिस, नगर निगम के गोताखोरों, एसडीआरएफ और अन्य बचाव दलों ने तलाश अभियान शुरू किया। नहर में पानी का प्रवाह बंद करवाने और संभावित बहाव क्षेत्र में तलाश के लिए इंतजाम किए जाने की जानकारी भी सामने आई। इन प्रयासों के बीच लापता युवकों के परिवारों की पीड़ा को समझना कठिन नहीं है। हर गुजरता पल उनके लिए उम्मीद और आशंका के बीच संघर्ष जैसा है।ऐसी परिस्थितियों में बचाव अभियान को पूरी गंभीरता से जारी रखना और प्रभावित परिवारों को नियमित जानकारी देना आवश्यक है। साथ ही, हादसे के कारणों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किन स्तरों पर सुरक्षा संबंधी चूक हुई और भविष्य में उन्हें कैसे रोका जा सकता है।लेकिन सरकार की जिम्मेदारी केवल जांच, निर्देश और अपील तक पूरी नहीं हो जाती। वास्तविक बदलाव तब आएगा, जब प्रत्येक बड़े धार्मिक आयोजन के लिए पहले से सुरक्षा योजना बनेगी और उसका पालन सुनिश्चित होगा।
श्रद्धा भी सुरक्षित रहे, किसी घर का चिराग भी न बुझे
दुर्गा प्रतिमा विसर्जन हमारी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका उद्देश्य उत्सव, सामूहिकता और श्रद्धा की अभिव्यक्ति है न कि परिवारों को ऐसी पीड़ा से गुजरने के लिए छोड़ देना, जिसका अंदाजा भी लगाना मुश्किल है। सुरक्षित विसर्जन की व्यवस्था धार्मिक परंपराओं में बाधा नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं के जीवन की रक्षा करने का आवश्यक माध्यम है।राजस्थान सरकार को कोटा की इस त्रासदी से सबक लेते हुए प्रदेशव्यापी विसर्जन सुरक्षा नीति बनानी चाहिए। प्रत्येक निर्धारित घाट पर विसर्जन के दिनों में प्रशिक्षित गोताखोरों और आवश्यक बचाव दलों की उपस्थिति अनिवार्य हो। नावों के संचालन, भीड़ प्रबंधन और आपातकालीन सहायता के स्पष्ट मानक तय किए जाएं तथा उनकी नियमित निगरानी हो। अब जरूरत केवल संवेदना जताने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें आस्था के उत्सव के बाद किसी परिवार को अपने प्रियजन की तलाश में नहर के किनारे खड़े होकर इंतजार न करना पड़े। कोटा की पीड़ा पूरे राजस्थान के लिए चेतावनी बने,ताकि भविष्य में किसी और शहर में ऐसी त्रासदी दोहराई न जाए और किसी मां की गोद, किसी बहन का भाई या किसी परिवार का सहारा लापरवाही की भेंट न चढ़े।
परम आदरणीय संपादक महोदय सादर प्रकाशन हेतु 👏
चार जिंदगियां नहर में समाईं, सवालों के घेरे में विसर्जन व्यवस्था! कोटा हादसे ने झकझोरा राजस्थान-अब तो जागे सरकार
ओम बिरला का घटनास्थल पर पहुंचकर पीड़ित परिवारों और लोगों से मिलना संवेदनशील पहल, लेकिन हर साल होने वाले विसर्जन आयोजनों में सुरक्षा के स्थायी इंतजाम करना सरकार की जिम्मेदारी
✍️डॉ नयन प्रकाश गांधी मैनेजमेंट विश्लेषक पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट
कोटा की चंबल दायीं मुख्य नहर में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान नाव पलटने से चार युवकों के लापता होने की घटना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि हमारी विसर्जन व्यवस्थाओं और सुरक्षा इंतजामों पर गंभीर सवाल है। मां दुर्गा की आराधना, श्रद्धा और आस्था के साथ शुरू हुआ उत्सव अचानक मातम और बेचैनी में बदल गया। जिन घरों में त्योहार की खुशियां होनी चाहिए थीं, वहां अपनों की सलामती की दुआएं होने लगीं। नहर के गहरे पानी में लापता युवकों की तलाश करते गोताखोर और घटनास्थल पर अपनों की राह देखते परिजन इस त्रासदी की भयावहता को बयां कर रहे थे।यह समय केवल दुख व्यक्त करने का नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों पर गंभीरता से विचार करने का भी है, जिनके कारण ऐसे हादसों की आशंका बनी रहती है। आखिर कब तक धार्मिक आस्था के आयोजनों में सुरक्षा की अनदेखी होती रहेगी? आखिर कब तक किसी दुर्घटना के बाद प्रशासनिक अमला सक्रिय होगा और फिर समय बीतने के साथ व्यवस्थाएं पुराने ढर्रे पर लौट जाएंगी? राजस्थान सरकार को अब इस सवाल का स्थायी जवाब देना होगा।
संवेदनशीलता का संदेश: घटनास्थल पर पहुंचे ओम बिरला
कोटा नहर हादसे की सूचना मिलने पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का घटनास्थल पर पहुंचना और वहां मौजूद लोगों से मिलकर स्थिति की जानकारी लेना संवेदनशील पहल रही। उन्होंने बचाव अभियान तेज करने के निर्देश दिए और लापता युवकों की तलाश के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी ली। संकट की इस घड़ी में जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी प्रभावित परिवारों को यह भरोसा दिलाने का माध्यम बन सकती है कि उनकी पीड़ा को सुना जा रहा है और प्रशासन उनकी सहायता के लिए जुटा है।ऐसे समय में जब परिजन अपनों की सलामती की उम्मीद लगाए बैठे हों, तब संवेदना के शब्दों के साथ जमीन पर सक्रिय सहयोग भी जरूरी होता है। ओम बिरला सहित मौके पर पहुंचे जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के सामने सबसे पहली प्राथमिकता लापता युवकों की तलाश, बचाव दलों को जरूरी संसाधन उपलब्ध कराना और प्रभावित परिवारों को हरसंभव सहायता देना है। लेकिन इस घटना से जुड़ा बड़ा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है,क्या ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए पहले से पर्याप्त इंतजाम किए गए थे? किसी हादसे के बाद बचाव अभियान तेज करना आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि दुर्घटना की आशंका को पहले ही कम किया जाए।
आस्था के उत्सव में सुरक्षा से समझौता क्यों?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, कोटा में प्रतिमा विसर्जन के दौरान नाव का संतुलन बिगड़ने से वह नहर में पलट गई। हादसे में तीन लोग सुरक्षित बाहर निकल आए, जबकि चार युवक लापता हो गए। घटनास्थल पर नहर की गहराई लगभग 40 से 50 फीट बताई गई। ऐसी परिस्थितियों में नाव पर क्षमता से अधिक भार, प्रतिमा को पानी में झुकाने की प्रक्रिया, नाव की स्थिरता और सुरक्षा संसाधनों की उपलब्धता जैसे पहलुओं का महत्व और बढ़ जाता है। हादसे के वास्तविक कारणों की जांच के साथ इन सभी बिंदुओं की पड़ताल होनी चाहिए।सबसे चिंताजनक बात यह सामने आई कि जिस स्थान पर नाव के जरिए प्रतिमाओं का विसर्जन कराया जा रहा था, वह प्रशासन द्वारा निर्धारित विसर्जन घाट नहीं था। वहां पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था, गोताखोरों और बचाव दलों की पूर्व तैनाती नहीं होने की जानकारी भी सामने आई। यदि किसी स्थान पर हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग प्रतिमा विसर्जन के लिए पहुंचते हैं, तो वहां सुरक्षा व्यवस्था को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि वह आधिकारिक रूप से निर्धारित घाट नहीं है।प्रशासन की जिम्मेदारी केवल निर्धारित घाट घोषित करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। लोगों को सुरक्षित घाटों तक पहुंचाने, अनधिकृत स्थानों पर विसर्जन रोकने और खतरनाक जलक्षेत्रों में नावों के इस्तेमाल पर प्रभावी नियंत्रण की व्यवस्था भी आवश्यक है।
राजस्थान सरकार बनाए प्रतिमा विसर्जन के लिए स्पष्ट नियमावली
देश के प्रतिष्ठित पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट एवं मैनेजमेंट एनालिस्ट डॉ नयन प्रकाश गांधी का मानना है कि कोटा की घटना राजस्थान सरकार के लिए एक चेतावनी है,सरकार को पूरे प्रदेश के लिए प्रतिमा विसर्जन की एक स्पष्ट, व्यावहारिक और अनिवार्य नियमावली तैयार करनी चाहिए। यह व्यवस्था केवल कोटा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, अजमेर, बीकानेर और प्रदेश के अन्य बड़े शहरों के साथ उन सभी कस्बों और क्षेत्रों में लागू होनी चाहिए, जहां बड़े पैमाने पर प्रतिमा विसर्जन होता है। यही नही राजस्थान के बाद भारत सरकार द्वारा राष्ट्रिय स्तर पर इस हेतु सभी राज्यों में स्पस्ट नियमावली बने
नियमावली में निम्नलिखित व्यवस्थाएं अनिवार्य की जानी चाहिए—
पहला, पंजीकृत एवं सुरक्षा-संपन्न विसर्जन घाट: प्रत्येक शहर और प्रमुख कस्बे में जलस्तर, गहराई, पहुंच मार्ग तथा स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर सुरक्षित विसर्जन स्थलों को चिह्नित किया जाए। घाटों का पंजीकरण हो और सुरक्षा मानकों की नियमित जांच की जाए।
दूसरा, विसर्जन के दिनों में गोताखोरों की अनिवार्य तैनाती: प्रत्येक निर्धारित घाट पर विसर्जन अवधि के दौरान प्रशिक्षित गोताखोर, एसडीआरएफ अथवा अन्य अधिकृत बचाव दल की आवश्यक उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। किसी भी आपात स्थिति में मदद पहुंचने में देरी न हो, इसके लिए बचाव दलों की तैनाती और प्रतिक्रिया व्यवस्था पहले से तय हो।
तीसरा, नावों के संचालन पर सख्त नियंत्रण: नाव की क्षमता से अधिक लोगों को बैठाने पर रोक हो। नाव की स्थिति, संतुलन, लाइफ जैकेट और अन्य आवश्यक सुरक्षा उपकरणों की जांच की जाए। प्रतिमा विसर्जन के लिए नाव का इस्तेमाल तभी हो, जब संबंधित स्थान पर इसकी अनुमति हो और आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था मौजूद हो।
चौथा, घाटों पर पुलिस और आपातकालीन सेवाएं: विसर्जन के दौरान पर्याप्त पुलिसकर्मी, प्राथमिक उपचार, एंबुलेंस, प्रकाश व्यवस्था, बैरिकेडिंग और आपातकालीन संपर्क व्यवस्था उपलब्ध रहे। भीड़ प्रबंधन के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की तैनाती भी पहले से सुनिश्चित की जाए।
पांचवां, खतरनाक स्थानों पर विसर्जन पर प्रभावी रोक: गहरी नहरों, तेज बहाव वाले जलक्षेत्रों और असुरक्षित किनारों पर विसर्जन रोकने के लिए स्पष्ट प्रतिबंध और निगरानी हो। केवल आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं है; उनका पालन भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
छठा, जनजागरूकता और जवाबदेही: आयोजकों, समितियों और आम नागरिकों को विसर्जन से पहले सुरक्षित घाटों की जानकारी दी जाए। नियमों के उल्लंघन पर जिम्मेदारी तय हो और हर बड़े आयोजन के बाद सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की जाए।
मंत्री की अपील के साथ प्रशासन को भी उठाने होंगे ठोस कदम
शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने हादसे के बाद लोगों से अपील की कि वे प्रतिमाओं का विसर्जन केवल प्रशासन द्वारा निर्धारित घाटों पर ही करें। उन्होंने बताया कि विसर्जन के लिए किशोरपुरा घाट पर व्यवस्था की गई थी, जबकि दुर्घटना वाला स्थान निर्धारित घाट नहीं था।यह अपील महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि निर्धारित घाटों पर पर्याप्त क्षमता, सुगम पहुंच, प्रशिक्षित बचावकर्मी और आवश्यक सुरक्षा संसाधन उपलब्ध हों। लोगों से नियमों का पालन करने की अपेक्षा तभी प्रभावी होगी, जब उन्हें सुरक्षित विकल्प मिलें और उन विकल्पों की जानकारी समय रहते पहुंचाई जाए।प्रशासन को विसर्जन से पहले ही सार्वजनिक सूचना जारी करनी चाहिए कि कौन-कौन से घाट अधिकृत हैं, किन स्थानों पर जाना प्रतिबंधित है और आपात स्थिति में किससे संपर्क किया जाए। स्थानीय निकायों, पुलिस, आपदा प्रबंधन विभाग और आयोजक समितियों के बीच समन्वय भी पहले से निर्धारित होना चाहिए।
हादसे के बाद नहीं, हादसे से पहले सक्रिय हो व्यवस्था
कोटा की घटना में पुलिस, नगर निगम के गोताखोरों, एसडीआरएफ और अन्य बचाव दलों ने तलाश अभियान शुरू किया। नहर में पानी का प्रवाह बंद करवाने और संभावित बहाव क्षेत्र में तलाश के लिए इंतजाम किए जाने की जानकारी भी सामने आई। इन प्रयासों के बीच लापता युवकों के परिवारों की पीड़ा को समझना कठिन नहीं है। हर गुजरता पल उनके लिए उम्मीद और आशंका के बीच संघर्ष जैसा है।ऐसी परिस्थितियों में बचाव अभियान को पूरी गंभीरता से जारी रखना और प्रभावित परिवारों को नियमित जानकारी देना आवश्यक है। साथ ही, हादसे के कारणों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किन स्तरों पर सुरक्षा संबंधी चूक हुई और भविष्य में उन्हें कैसे रोका जा सकता है।लेकिन सरकार की जिम्मेदारी केवल जांच, निर्देश और अपील तक पूरी नहीं हो जाती। वास्तविक बदलाव तब आएगा, जब प्रत्येक बड़े धार्मिक आयोजन के लिए पहले से सुरक्षा योजना बनेगी और उसका पालन सुनिश्चित होगा।
श्रद्धा भी सुरक्षित रहे, किसी घर का चिराग भी न बुझे
दुर्गा प्रतिमा विसर्जन हमारी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका उद्देश्य उत्सव, सामूहिकता और श्रद्धा की अभिव्यक्ति है न कि परिवारों को ऐसी पीड़ा से गुजरने के लिए छोड़ देना, जिसका अंदाजा भी लगाना मुश्किल है। सुरक्षित विसर्जन की व्यवस्था धार्मिक परंपराओं में बाधा नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं के जीवन की रक्षा करने का आवश्यक माध्यम है।देश के प्रतिष्ठित पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट एवं मैनेजमेंट एनालिस्ट डॉ नयन प्रकाश गांधी का मानना है कि राजस्थान सरकार को कोटा की इस त्रासदी से सबक लेते हुए प्रदेशव्यापी विसर्जन सुरक्षा नीति बनानी चाहिए। प्रत्येक निर्धारित घाट पर विसर्जन के दिनों में प्रशिक्षित गोताखोरों और आवश्यक बचाव दलों की उपस्थिति अनिवार्य हो। नावों के संचालन, भीड़ प्रबंधन और आपातकालीन सहायता के स्पष्ट मानक तय किए जाएं तथा उनकी नियमित निगरानी हो। अब जरूरत केवल संवेदना जताने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें आस्था के उत्सव के बाद किसी परिवार को अपने प्रियजन की तलाश में नहर के किनारे खड़े होकर इंतजार न करना पड़े। कोटा की पीड़ा पूरे राजस्थान के लिए चेतावनी बने,ताकि भविष्य में किसी और शहर में ऐसी त्रासदी दोहराई न जाए और किसी मां की गोद, किसी बहन का भाई या किसी परिवार का सहारा लापरवाही की भेंट न चढ़े।