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श्मशान की खामोशी में जीवदया की आवाज! हरिकृष्ण बिरला के सेवा-सरोकारों को कोटा का सलाम

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श्मशान की खामोशी में जीवदया की आवाज! हरिकृष्ण बिरला के सेवा-सरोकारों को कोटा का सलाम



जन्मदिवस विशेष | किशोरपुरा मुक्तिधाम में मानवीय संवेदना, गौसेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व की अनूठी मिसाल


✍️ डॉ. नयन प्रकाश गांधी

युवा मैनेजमेंट विश्लेषक, पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट एवं मीडिया स्तंभकार, कोटा


राजनीति में किसी व्यक्ति की पहचान अक्सर उसके पद, प्रतिष्ठा, चुनावी उपलब्धियों और राजनीतिक प्रभाव से होती है, लेकिन किसी व्यक्तित्व की वास्तविक ऊंचाई का आकलन उन संवेदनाओं से भी होता है, जिन्हें वह अपने व्यवहार और कर्मों में स्थान देता है। कोटा-बूंदी की राजनीति में ‘छोटे भाईसाहब’ के नाम से पहचाने जाने वाले हरिकृष्ण बिरला का व्यक्तित्व इसी दृष्टि से चर्चा का विषय है। उनके जन्मदिवस पर उनके राजनीतिक और संगठनात्मक योगदान के साथ सामाजिक सरोकारों के उस पक्ष को भी समझना जरूरी है, जो उन्हें एक अलग पहचान देता है।


किशोरपुरा मुक्तिधाम : जहाँ अंतिम विदाई के बीच जीवदया की नई सुबह दिखाई देती है


जीवन में कुछ स्थान ऐसे होते हैं, जहां पहुंचकर मनुष्य को जीवन की वास्तविकता का बोध होता है। श्मशान भी ऐसा ही स्थान है, जहां पद, प्रतिष्ठा, संपत्ति और राजनीतिक प्रभाव सब पीछे छूट जाते हैं। रह जाती हैं तो केवल मानवीय संवेदनाएं और कर्मों की स्मृतियां। कोटा के किशोरपुरा मुक्तिधाम से हरिकृष्ण बिरला का जुड़ाव इसी संवेदनशीलता का एक उल्लेखनीय प्रसंग है।


मुक्तिधाम की दशा और दिशा बदलने में उनकी भूमिका का उल्लेख सार्वजनिक समाचार रिपोर्टों में भी मिलता है। इस परिसर से जुड़ी गौसेवा और निराश्रित गोवंश के लिए चारे-पानी की व्यवस्था का भाव सेवा की उस भारतीय परंपरा की याद दिलाता है, जिसमें जीवमात्र के प्रति करुणा को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।


जरा सोचिए, जिस स्थान पर लोग अपने प्रियजनों को अंतिम विदाई देने आते हैं, उसी परिसर में किसी भूखी गाय के लिए चारे और प्यासे जीव के लिए पानी की व्यवस्था करना कितनी गहरी मानवीय भावना का परिचय देता है। जीवन की अंतिम विदाई के बीच किसी दूसरे जीव के जीवन की चिंता करना अपने आप में संवेदना का ऐसा संदेश है, जिसे शब्दों से अधिक कर्मों के माध्यम से समझा जा सकता है।


गौसेवा केवल हरा चारा डाल देने तक सीमित नहीं है। इसमें नियमित भोजन, स्वच्छ पानी, चिकित्सा, सुरक्षित आश्रय और निराश्रित पशुओं की देखभाल जैसी निरंतर जिम्मेदारियां शामिल हैं। वास्तविक सेवा वही है जो किसी जीव की पीड़ा कम करे और उसकी जरूरतों को समझे। यही सोच जीवदया को धार्मिक भावना से आगे बढ़ाकर सामाजिक उत्तरदायित्व का स्वरूप देती है।


सादगी का वैभव और मुस्कुराहट में छिपा व्यक्तित्व का ओज


हर व्यक्तित्व की चमक उसके धन-धान्य, वैभव, शान-शौकत और भौतिक सुविधाओं से नहीं मापी जा सकती। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनकी सबसे बड़ी पूंजी उनका निर्मल मन, सहज व्यवहार और चेहरे पर बनी रहने वाली आत्मीय मुस्कान होती है। हरिकृष्ण बिरला का व्यक्तित्व इसी सादगी और सहजता के संदर्भ में चर्चा का विषय है। उनके चेहरे का ओज, बातचीत की आत्मीयता और अंतर्मन से झलकती मुस्कुराहट सामने वाले को सहज ही अपना बना लेने का भाव पैदा करती है। उनके व्यक्तित्व में दिखावे से अधिक व्यवहार और औपचारिकता से अधिक आत्मीयता दिखाई देती है।


किसी व्यक्ति की वास्तविक संपन्नता इस बात में भी होती है कि उसके पास दूसरों के लिए कितना समय, कितना अपनापन और कितनी संवेदना है। हरिकृष्ण बिरला की सादगी और मिलनसारिता को उनके व्यक्तित्व का ऐसा पक्ष माना जाता है, जिससे आज की युवा पीढ़ी बहुत कुछ सीख सकती है। राजनीति में जहां मतभेद कभी-कभी मनभेद का रूप ले लेते हैं, वहां अपनी वाकपटुता, संवाद-कौशल और समन्वय की शैली से विरोधियों को भी बातचीत के दायरे में लाना एक अलग तरह की राजनीतिक कला है। असहमति के बावजूद संवाद बनाए रखना और संबंधों में सहजता कायम रखना सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण विशेषता है।


आज के युवाओं के लिए उनका यह व्यवहार एक महत्वपूर्ण सीख है कि सफलता केवल पद और प्रतिष्ठा हासिल करने में नहीं, बल्कि लोगों के साथ संबंधों को सम्मानपूर्वक निभाने और कठिन परिस्थितियों में भी संवाद का रास्ता खुला रखने में है।


दिल्ली की व्यस्तता के बीच कोटा की संगठनात्मक धड़कन


लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला की संसदीय जिम्मेदारियां उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यस्त रखती हैं। ऐसे में कोटा-बूंदी क्षेत्र में संगठनात्मक संपर्क, कार्यकर्ताओं से संवाद और सामाजिक गतिविधियों की निरंतरता बनाए रखना भी एक बड़ी जिम्मेदारी बन जाती है। इस संदर्भ में हरिकृष्ण बिरला की भूमिका एक सक्रिय संगठनात्मक चेहरे के रूप में सामने आती है।


भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच ‘छोटे भाईसाहब’ के रूप में उनकी पहचान केवल आत्मीय संबोधन नहीं, बल्कि संगठनात्मक संपर्क और समन्वय से बने संबंधों का परिचायक है। कार्यकर्ताओं को जोड़ना, उनकी जिम्मेदारियों का ध्यान रखना, जरूरत पड़ने पर स्पष्ट शब्दों में समझाना और अच्छा काम करने वालों का उत्साह बढ़ाना संगठनात्मक प्रबंधन के महत्वपूर्ण पहलू हैं।


उनकी भूमिका का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि कार्यकर्ताओं की ऊर्जा को केवल चुनावी गतिविधियों तक सीमित रखने के बजाय सामाजिक सरोकारों, जनसंपर्क और सेवा कार्यों से जोड़ने की संभावनाएं सामने आती हैं। राजनीति जब समाजनीति और जननीति से जुड़ती है, तभी उसका व्यापक सामाजिक अर्थ बनता है। बूथ और वार्ड का कार्यकर्ता यदि जनता की समस्याओं को समझने, जरूरतमंदों तक पहुंचने और सेवा गतिविधियों में भागीदारी निभाने लगे, तो संगठन का रिश्ता केवल चुनाव तक सीमित नहीं रहता।


कोटा-बूंदी की क्षेत्रीय राजनीति में संगठनात्मक सक्रियता और कार्यकर्ताओं के समन्वय को बनाए रखने में हरिकृष्ण बिरला के योगदान की चर्चा इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। ओम बिरला की संसदीय व्यस्तताओं के बीच क्षेत्रीय संगठन को सक्रिय रखने और कार्यकर्ताओं को सामाजिक गतिविधियों से जोड़ने के प्रयासों में उनकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


संगठन की असली ताकत व्यक्ति नहीं, तैयार कार्यकर्ता होते हैं


किसी भी राजनीतिक संगठन की वास्तविक शक्ति उसके बूथ और वार्ड स्तर के कार्यकर्ता होते हैं। चुनाव के समय वही मतदाता तक पहुंचता है, संगठन का संदेश पहुंचाता है और रणनीति को जमीन पर उतारता है। लेकिन चुनाव समाप्त होने के बाद भी उसकी जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। जनता की समस्याएं सुनना, जरूरतमंदों की सहायता करना और स्थानीय प्रशासन तक जनआवाज पहुंचाना भी संगठनात्मक दायित्व का हिस्सा है।


हरिकृष्ण बिरला के सामने अवसर है कि वे अपने संगठनात्मक संपर्कों को युवाओं और महिलाओं की अधिक भागीदारी, नए नेतृत्व के निर्माण और स्थानीय समस्याओं के समाधान से जोड़ें। कोटा शहर में पेयजल, सफाई, सड़क और यातायात जैसे मुद्दे हैं, तो ग्रामीण क्षेत्रों में किसान, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी अपेक्षाएं हैं। कार्यकर्ताओं की ऊर्जा इन समस्याओं के समाधान में लगे, तो राजनीति का सामाजिक उपयोग और अधिक सार्थक हो सकता है।


किसी भी नेतृत्व की दीर्घकालिक सफलता इस बात से तय होती है कि वह अपने साथ कितने नए नेतृत्व तैयार करता है और ऐसी व्यवस्था कितनी मजबूत बनाता है जो किसी एक व्यक्ति की उपस्थिति पर निर्भर न रहे।


जन्मदिवस पर शुभकामना से आगे, सेवा का संकल्प


हरिकृष्ण बिरला के जन्मदिवस पर उनके व्यक्तित्व के इन विभिन्न पक्षों को याद करना इसलिए प्रासंगिक है कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्तियों की उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल राजनीतिक समीकरणों से नहीं होना चाहिए। उनकी सादगी, संवादशीलता, संगठनात्मक सक्रियता और सामाजिक सरोकारों को भी उसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए।


जन्मदिन पर फूलों के गुलदस्ते, अभिनंदन समारोह और शुभकामनाएं तो हर वर्ष मिलती हैं, लेकिन किसी व्यक्ति के लिए इससे बड़ा सम्मान क्या होगा कि उसके सेवा-सरोकार समाज में नई संवेदनाएं पैदा करें। किशोरपुरा मुक्तिधाम में जीवदया का भाव हो, निराश्रित गोवंश की देखभाल हो या कार्यकर्ताओं को सामाजिक सेवा से जोड़ने का प्रयास—इन गतिविधियों को निरंतरता और संस्थागत स्वरूप देना ही इनका वास्तविक विस्तार होगा।


कोटा की सामाजिक चेतना और युवा शक्ति के सामने भी यह अवसर है कि सेवा को केवल किसी एक व्यक्ति की पहल न रहने देकर सामूहिक जनअभियान बनाया जाए।


क्योंकि राजनीति से पहचान मिल सकती है, पद से प्रतिष्ठा मिल सकती है, लेकिन किसी भूखे जीव को चारा और प्यासे जीव को पानी उपलब्ध कराने की संवेदना ही मनुष्य को वास्तव में मानवीय बनाती है।


हरिकृष्ण बिरला को जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। ईश्वर से कामना है कि उनके जीवन में सादगी, सेवा, संवाद और सामाजिक संवेदना का यह भाव निरंतर बना रहे तथा कोटा-बूंदी की धरती पर जनसेवा की नई प्रेरणाएं जन्म लेती रहें।