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ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में गूंजा पीएम मोदी का वक्तव्य

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ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में गूंजा पीएम मोदी का वक्तव्य


और तेज होगी भारत के सुधारों की रफ्तार, ‘दृढ़ विश्वास’ की अर्थनीति से वैश्विक अवसरों पर नजर


 

✍️डॉ नयन प्रकाश गांधी ,युवा मैनेजमेंट विश्लेषक पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट करियर कोच 



वैश्विक अर्थव्यवस्था जब भू-राजनीतिक तनाव, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और आपूर्ति शृंखलाओं की अनिश्चितताओं से गुजर रही है, तब भारत की आर्थिक दिशा और सुधारों की निरंतरता पर दुनिया की नजरें टिकना स्वाभाविक है। नई दिल्ली में 13 अक्टूबर 2026 को आयोजित ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के आर्थिक दृष्टिकोण को एक स्पष्ट संदेश के साथ प्रस्तुत किया—भारत के लिए सुधार केवल परिस्थितियों की मजबूरी नहीं, बल्कि दृढ़ विश्वास का विषय हैं। उनका वक्तव्य भारत की विकास रणनीति, वैश्विक साझेदारी और नागरिकों के आर्थिक सशक्तीकरण के बीच संबंधों को समझने का अवसर देता है।


ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वक्तव्य केवल एक भाषण नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक दिशा का घोषणापत्र है। जब उन्होंने कहा - "रिफॉर्म्स हमारे लिए मजबूरी नहीं, हमारा दृढ़ विश्वास हैं", तो यह वाक्य वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत को एक भरोसेमंद स्तंभ के रूप में स्थापित करता है।


ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की ताजा रिपोर्ट और प्रधानमंत्री के आंकड़े एक ही कहानी कहते हैं - भारत अब धीमी गति से नहीं, बल्कि रिफॉर्म्स एक्सप्रेस की तेज गति से दौड़ने को तैयार है।


मजबूत नींव पर टिकी 7.8% की ग्रोथ


तेरह साल पहले भारत का चालू खाता घाटा जीडीपी के 4 प्रतिशत से अधिक था, जो आज घटकर 0.61 प्रतिशत रह गया है। विदेशी मुद्रा भंडार 700 अरब डॉलर से ऊपर, बैंकिंग प्रणाली दशकों में सबसे मजबूत स्थिति में, और संप्रभु रेटिंग में अपग्रेड - ये आंकड़े बताते हैं कि 7.8 प्रतिशत की तिमाही वृद्धि किसी संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि संरचनात्मक सुधारों का प्रतिफल है।


विश्व जब आपूर्ति श्रृंखला, ऊर्जा, खनिज और तकनीक को दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल होते देख रहा है, तब भारत "विश्वास" का पर्याय बनकर उभरा है। प्रधानमंत्री का यह कहना कि "भारत किसी की कीमत पर नहीं, बल्कि दुनिया के साथ और दुनिया के लिए बढ़ता है", भारत की नई वैश्विक भूमिका को रेखांकित करता है।


☝️क्या हैं वे सुधार जिनकी रफ्तार बढ़ेगी?


मोदी ने जिन सुधारों का उल्लेख किया, वे भारत के व्यापार करने की सुगमता की कहानी कहते हैं। जीएसटी ने देश को एक बाजार बनाया, दिवाला कानून (IBC) ने कर्ज संस्कृति को अनुशासन दिया, 29 श्रम कानूनों को 4 कोड में समेटना श्रमिक और उद्योग दोनों के हित में है, और सैकड़ों छोटे कारोबारी अपराधों को अपराध की श्रेणी से हटाना - यह लघु उद्यमी को भयमुक्त करने का कदम है। 2000 से अधिक ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) का भारत से संचालित होना इस विश्वास का प्रमाण है।


☝️ब्लूमबर्ग का दीर्घकालिक पूर्वानुमान: भारत बनेगा ग्रोथ का पोल


इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट सबसे बड़ा संकेत देती है। जब दुनिया की औसत वृद्धि 3.2 प्रतिशत पर सिमट रही है, तब भारत की वृद्धि 2016-25 के 5.9 प्रतिशत से बढ़कर 2026-35 में 7.7 प्रतिशत होने का अनुमान है। यानी भारत उन गिने-चुने देशों में होगा जो तेज होगा, जबकि विकसित देश सुस्त पड़ेंगे।


रिपोर्ट के अनुसार, भारत का विस्तारित मुक्त व्यापार समझौता (FTA) नेटवर्क 2035 तक 140 से 170 अरब डॉलर का अतिरिक्त जीडीपी जोड़ सकता है। वहीं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से हर साल 0.9 प्रतिशत की अतिरिक्त वृद्धि मिल सकती है। सौर ऊर्जा क्षमता 2014 के 75 गीगावाट से बढ़कर 300 गीगावाट होना और पीएम सूर्य घर, पीएम कुसुम जैसी योजनाओं से 30 गीगावाट से अधिक का जुड़ना बताता है कि सुधार केवल कानूनों में नहीं, खेत और घर तक पहुंच रहे हैं।


 ☝️‘पावर टू एम्पावर’: तकनीक से नागरिक सशक्तीकरण तक


प्रधानमंत्री के संबोधन का एक अन्य प्रमुख विचार था—सत्ता या शक्ति का उद्देश्य केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि लोगों को सक्षम बनाना होना चाहिए। तकनीक, डेटा, ज्ञान और नवाचार की बढ़ती भूमिका के संदर्भ में यह विचार विशेष महत्व रखता है। डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन सार्वजनिक सेवाएं और तकनीक आधारित उद्यमों ने आर्थिक गतिविधियों के नए रास्ते खोले हैं। अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि इन सुविधाओं का लाभ महानगरों तक सीमित न रहे, बल्कि छोटे शहरों, ग्रामीण क्षेत्रों, महिलाओं, विद्यार्थियों और छोटे उद्यमियों तक भी पहुंचे।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन के विस्तार के साथ युवाओं के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं, लेकिन कौशल-अंतर और रोजगार की गुणवत्ता जैसी चुनौतियों की अनदेखी नहीं की जा सकती। इसलिए शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, डिजिटल साक्षरता और उद्योगों की वास्तविक जरूरतों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।पावर टू एम्पावर" - शक्ति को सशक्तिकरण में बदलने का मंत्र ही भारत के सुधारों का मूल है। 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालते हुए 7.8 प्रतिशत की वृद्धि हासिल करना यह सिद्ध करता है कि सुधार और समावेश एक साथ चल सकते हैं।


ब्लूमबर्ग मंच से दिया गया संदेश स्पष्ट है - भारत में सुधार अब रुकने वाले नहीं। यह एक्सप्रेस अब और तेज दौड़ेगी, क्योंकि इसके पीछे मजबूरी नहीं, बल्कि विकसित भारत 2047 का दृढ़ विश्वास है।ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वक्तव्य भारत की सुधार-आधारित आर्थिक सोच और वैश्विक सहयोग की आकांक्षा को सामने रखता है। अब इस सोच की प्रभावशीलता का आकलन ठोस परिणामों से होगा,निवेश, उत्पादकता, रोजगार, उद्यमिता और नागरिकों के जीवन में आए बदलावों से।भारत के पास विशाल घरेलू बाजार, युवा मानव संसाधन और तेजी से विकसित होता डिजिटल तंत्र है। इन क्षमताओं को टिकाऊ आर्थिक प्रगति में बदलने के लिए सुधारों की निरंतरता के साथ संस्थागत मजबूती, पारदर्शी शासन और अवसरों का न्यायसंगत वितरण आवश्यक है।दृढ़ विश्वास की अर्थनीति का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब नीतियों में दिखाई देने वाला बदलाव आम नागरिक के जीवन में बेहतर अवसर, सम्मानजनक रोजगार और आर्थिक सुरक्षा के रूप में महसूस हो। यही भारत के अगले आर्थिक अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी होगी।