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नरसिंहगढ़ की आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक है पतालेश्वर महादेव (छोटे महादेव) मंदिर*

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 *‘’हर मंदिर की कहानी, आस्था की जुबानी’’* 


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 *राजगढ़ 23 सितम्बर, 2026* 


     राजगढ़ जिले के मालवा का मिनी कश्मीर के नाम से प्रख्यात, प्राकृतिक सौन्दर्यता बिखेरती कटोरा नुमा पहाड़ियों के बीच स्थित ऐतिहासिक नगर नरसिंहगढ जहाँ श्रावण मास में बरसात के मौसम में पहाड़ियों से कल कल करते झरने बहते हैं, जहाँ के कुंड का पानी कई बीमारियों को दूर करता हो, जहाँ की गुफाओ में प्राचीन काल के शिल्पकला मौजूद हैं जो यहां की वर्षो पुरानी संस्कृति को बयां करती हैं रियासत काल के कई मंदिर यहां की धार्मिक परंपरा को बताते हैं, क्षेत्र में मौजूद वन्य प्राणी अभ्यारण जीव जंतुओ के प्रति लगाव प्रदर्शित करते हैं नगर में मौजूद तालाब यहां के वर्षो पुराने जल संरक्षण को बताते हैं ऐसे समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, प्राकृतिक सौंदर्य और प्राचीन धार्मिक स्थलों के लिए प्रसिद्ध नगर नरसिंहगढ के धार्मिक स्थलों में पतालेश्वर महादेव (छोटे महादेव) मंदिर का विशेष स्थान है। घने जंगल, पहाड़ी परिवेश, गर्मी में भी न सूखने वाले कुंड और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच स्थित यह मंदिर भगवान भोलेनाथ के प्रति श्रद्धा रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है। जिला प्रशासन की पर्यटन वेबसाइट पर भी पतालेश्वर महादेव (छोटे महादेव) मंदिर को नरसिंहगढ़ के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में शामिल किया गया है।


 *नरसिंहगढ़ के पतालेश्वर महादेव (छोटे महादेव) मंदिर का इतिहास* 


 विंध्याचल की पहाड़ियों में बसे हुए पातालेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास कई वर्षो पुराना है ऐसा माना जाता है कि मंदिर में विराजमान शिवलिंग पाताल लोक से जुड़ा हुआ है घने जंगल में स्थित इस शिवलिंग की किसी के द्वारा स्थापना नहीं की गई है शिवलिंग स्वयंभू होने के कारण इन्हें पातालेश्वर महादेव कहा जाता है। पुजारी श्री शिव शंकर शर्मा बताते हैं कि उनका परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी छोटा महादेव मंदिर की पूजा अर्चना करता आ रहा हैं। पूर्वज बताते थे कि कई वर्षो पूर्व  शिकार के दौरान नरसिंहगढ रियासत के राजा की दृष्टि घने जंगलो के बीच वट वृक्ष के नीचे विराजमान इस शिवलिंग पर पड़ी तो उन्होंने रूककर शिवलिंग की पूजा अर्चना की तथा जीर्णोद्धार करवाया, पुजारी श्री शर्मा इस मंदिर के बारे आगे बताते हैं कि कई वर्षो बाद नरसिंहगढ रियासत के राजा नें विधि विधान से बड़े आकार के शिवलिंग की स्थापना के उद्देश्य से अन्य प्रदेश से एक अन्य शिवलिंग तथा नंदी की मूर्ति मंगवाई स्थापना के दिन भयंकर आंधी तूफान के साथ वर्षा हुई जिसमे बड़े आकार के नंदी बह जाने से नंदी की मूर्ति खंडित हो गई। बताया जाता हैं कि तत्कालीन राजा को स्वप्न में भोलेनाथ नें स्वयं आकर कहा कि कई वर्षो से मै इस घने जंगल में विराजमान था, खुले में धूप, वर्षा, पक्षियों की बीट आदि सब कुछ सहन किया औऱ अब तु मुझे हटाने की सोच रहा हैं। उसके बाद से राजा ने अन्य शिवलिंग की स्थापना का विचार त्याग दिया तथा पानी में बहने से खंडित हो गई नंदी की मूर्ति गर्भ गृह के बाहर रखवा दी तथा मंगाए गए शिवलिंग व जलेरी को गर्भ गृह में एक तरफ रखवा दिया गया।


     पुजारी श्री शर्मा बताते हैं कि यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आस्था का केंद्र है प्रतिवर्ष श्रावण मास में यहां मेला लगता है। हजारों की संख्या में श्रद्धालु दूर-दूर से आकर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करने आते हैं। मान्यता है कि संतान प्राप्ति हेतु मंदिर के पीछे साथिया बनाकर मनोकामना पूर्ण करने का आशीर्वाद लिया जाता है तथा मनोकामना पूर्ण होने पर दंपत्ति उसे स्थान पर आकर सीधा साथिया बनाते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि इस मंदिर के कुंड के जल से स्नान करने पर बीमारिया दूर हो जाती है। 

प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि पर यहां रात्रि भजन संध्या का आयोजन किया जाता है। जिसमें बाहर से आने वाले संगीत कलाकार अपने भजनों की प्रस्तुति देते हैं।


     रियासत काल में घने जंगलों के बीच स्थित इस मंदिर में श्रावण मास में साधु संतों के रुकने के लिए इस मंदिर में रियासत के माध्यम से व्यवस्था की जाती थी। साधु संतों की जमाते करीब चार माह इस मंदिर में निवास करती थी तथा बाबा भोलेनाथ की पूजा अर्चना करती थी,  मंदिर में एक छज्जा भी बना हुआ है, बताया जाता हैं कि इसी छज्जे में राज परिवार की महिलाये रुककर भजन कीर्तन सुना करती थी।

मंदिर प्रांगण में ही प्राचीन समय में बना हुआ एक राम जानकी मंदिर भी स्थित है। तथा पूर्व मुखी बड़े गणेश जी एवं दक्षिण मुखी श्री हनुमान जी की प्रतिमा मौजूद है। मंदिर प्रांगण में जल स्रोत के लिए एक कुंड है, पहाड़ी के समीप वन्य प्राणी अभ्यारण चिड़ी खो लगा हुआ होने से तथा घना जंगल होने से गर्मी के मौसम में कई बार तेंदूआ इस मंदिर के कुंड में पानी पीने आया करते थे।

 

 *प्राकृतिक परिवेश में स्थित है मंदिर* 


    पतालेश्वर महादेव (छोटे महादेव) मंदिर की विशेषता केवल इसकी धार्मिक पहचान ही नहीं, बल्कि इसका प्राकृतिक परिवेश भी है। नरसिंहगढ़ का भू-दृश्य पहाड़ियों (गऊ घाटी), हरियाली, जलस्रोतों (जलकुण्ड) और प्राकृतिक झरनों से समृद्ध है। जिला प्रशासन ने नरसिंहगढ़ को ऐतिहासिक एवं पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण नगर के रूप में वर्णित किया है और पतालेश्वर महादेव (छोटे महादेव) को यहां के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में स्थान दिया है। मंदिर के आसपास का प्राकृतिक वातावरण श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आध्यात्मिक शांति के साथ-साथ प्रकृति के निकट आने का अवसर प्रदान करता है। वर्षा ऋतु और सावन के दौरान क्षेत्र की हरियाली और प्राकृतिक सौंदर्य विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाता है।


 *धार्मिक आस्था के साथ पर्यटन की भी पहचान* 


     नरसिंहगढ़ के पतालेश्वर महादेव (छोटे महादेव) मंदिर को केवल धार्मिक स्थल के रूप में ही नहीं, बल्कि नगर की ऐतिहासिक एवं पर्यटन विरासत के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में भी देखा जाता है। मध्यप्रदेश विधानसभा के अभिलेखों में भी नरसिंहगढ़ के ऐतिहासिक छोटे महादेव का उल्लेख पर्यटन स्थलों के संदर्भ में किया गया है। आज पतालेश्वर महादेव (छोटे महादेव) मंदिर नरसिंहगढ़ की धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक विरासत और प्राकृतिक सौंदर्य को एक साथ समेटे हुए है। प्राचीन परंपराओं से जुड़ा यह स्थल आने वाली पीढ़ियों के लिए नरसिंहगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक विरासत को संजोए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है।